अमित शाह मंत्री बने तो रहेंगे नुक़सान में !

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– दीपक पचोरी –

म चुनावों में लगातार दो बार प्रचंड बहुमत से जीत दिलाने वाले भाजपा के इकलौते अध्यक्ष इन चुनावों में अहमदाबाद से जीत कर सांसद भी बन गए हैं. ऐसे में अटकलों के बाज़ारों में आग लगी हुई है. सभी ये मान रहे हैं कि शाह को कोई प्रमुख मंत्रालय मिल सकता है. मगर प्रश्न ये है की क्या शाह को मंत्री बनाना चाहिए? और बन भी गए तो उनका ऐसा क्या ख़ास प्रमोशन हो जाएगा? उल्टा उनका “व्यक्तिगत” नुक़सान ही होगा.

प्रधानमंत्री और उनके सलाहकार मंडल को बहुत माथापच्ची करके समीकरण बैठने होंगे

चुनाव के नतीजों से साफ़ ज़ाहिर है की पुराने हटेंगे नहीं और नए चेहरों को जगह भी देनी होगी. वाजिब है की इस बात की चर्चा अब गरम है कि  मोदी मंत्रिमंडल में कौन-कौन शामिल हो सकता है. इनमें सबसे चर्चित नाम है गांधी नगर से भारी मतों से जीते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का. अमित शाह को कोई प्रमुख मंत्रालय मिल सकता है, वो गृह होगा या विदेश, वो सूचना होगा या रक्षा मंत्रालय ये तो वक़्त बताएगा मगर प्रश्न सिर्फ़ यही है की उनको क्या मंत्री बनाना चाहिए या अध्यक्ष पद पर बने रहना चाहिए.

सीधा सा आंकलन करें तो मंत्री तो कई होते हैं मगर प्रधान मंत्री और अध्यक्ष एक एक ही होते हैं. पार्टी में सिर्फ़ इन दोनों की ही महिमा होती है, सिर्फ़ इन दोनों के पास ही फ़ैसले लेने के अधिकार होते हैं. और यही दोनों देश भर में “पोस्टर बॉय” होते हैं. पूर्व भाजपा अध्यक्ष और निवर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को ही ले लीजिए. वो केंद्रीय मंत्री बने, सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय भी मिला, मगर भाजपा के पोस्टरों से ग़ायब हो गए. ना वो पावर रहा ना ही वो दबदबा. वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षकों की माने तो ये राजनाथ सिंह का “डिमोशन” ही था. उन्हें मंत्री मंडल में शामिल किया गया था उनका पार्टी में बढ़ता क़द छाँटने के लिए. अध्यक्ष होने के नाते उनकी पोज़ीशन प्रधानमंत्री के ऊपर थी. जहाँ वो लाइन में सबसे आगे खड़े होते थे, जहाँ वो देश भर में प्रधानमंत्री के साथ बराबरी से पोस्टरों में होते थे, मंत्री बनने के बाद वो एक लम्बी लाइन का हिस्सा मात्र बन कर रह गए. पोस्टरों में उनका स्थान नए अध्यक्ष महोदय अमित शाह ने ले लिया था. अब शाह मंत्री बनेगें तो पोस्टरों में उनका स्थान नए अध्यक्ष ले लेंगे और अमित शाह भी एक लम्बी लाइन का हिस्सा बन कर रह जाएँगे.

राजनाथ सिंह का उदाहरण देखते हुए प्रश्न ये भी उठता है की क्या नरेंद्र मोदी को  अमित शाह के बढ़ते क़द से प्रोब्लम है? क्या वो उनको मंत्रालय थमा कर चलता करना चाहते हैं? भाजपा अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने नरेंद्र मोदी के साथ बराबरी की पारी खेली है. मोदी जहाँ नहीं जा पाए, शाह ने वहाँ जा कर पार्टी की धाक जमाई. वो मोदी के मित्र, विश्वस्थ और सफल सलाहकार रहे हैं. पार्टी पर मोदी के नियंत्रण को पुख़्ता करने में शाह की अहम भूमिका रही है. क्या मोदी को शाह के टक्कर का, शाह की विश्वसनीयता और क़ाबिलियत का अध्यक्ष मिल पाएगा. क्या नितिन गड़करी को अध्यक्ष पद सौंप कर संघ की मंशा पूरी की जाएगी? क्या नितिन गड़करी अपनी 5 सालों की मेहनत का फल किसी और को देकर भाजपा अध्यक्ष बनाना चाहेंगे?

बीजेपी को मिली प्रचंड जीत के बाद अब इस बात की चर्चा होने लगी है कि अगले हफ्ते नरेंद्र मोदी के पीएम पद की शपथ लेने के बाद उनके मंत्रिमंडल में कौन-कौन शामिल हो सकता है. कई अन्य मंत्रियों की उनके काम का इनाम देते हुए तरक्की हो सकती है. मंत्रिमंडल में फेरबदल होना तो लगभग तय है. प्रधानमंत्री और उनके सलाहकार मंडल को बहुत माथापच्ची करके समीकरण बैठने होंगे. एक तरफ़ शिवसेना जैसी सहयोगी पार्टियों की अपेक्षाएँ केंद्रीय मंत्रिमंडल में बेहतर प्रतिनिधित्व पाने की होगी वहीं जीकर वापस आए स्मृति इरानी और बंगाल के क्षत्रपों को भी ईनाम की आशा होगी. कुछ को ख़ुशी और कुछ को ग़म तो मिलना ही है पर प्रधानमंत्री की ये कोशिश अवश्य होगी की किसी का दिल ना टूटे.

गुजरात में नरेंद्र मोदी के सीएम रहने के दौरान अमित शाह उनकी सरकार में गृह मंत्री रह चुके हैं. इसलिए इसकी भी चर्चा है कि अमित शाह को केंद्र सरकार में गृह मंत्री बनाया जा सकता है. लेकिन मोदी की पहली सरकार में गृह मंत्री रहे राजनाथ सिंह इस बार भी लखनऊ से जीते हैं और पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से हैं. यह भी लगता है कि राफेल पर घोटाले के आरोपों के बीच सफलता से मंत्रालय संभालने वाली निर्मला सीतारमण को फिर से रक्षा मंत्रालय मिलेगा. दूसरी तरफ, सरकार के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाने वाले रेल मंत्री पीयूष गोयल को इस बार ज्यादा महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकता है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली की सेहत को लेकर चिंता है. उन्हें गुरुवार को ही दिल्ली के एम्स से डिस्चार्ज किया गया है. जेटली करीब तीन हफ्ते से ऑफिस नहीं जा रहे थे. वह मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में ज्यादातर समय वित्त मंत्री रहे. इस साल 22 जनवरी को अमेरिका में एक महत्वपूर्ण सर्जरी कराने की वजह से वह मोदी सरकार का अंतिम बजट पेश नहीं कर पाए थे और पीयूष गोयल को यह जिम्मेदारी दी गई थी. अब प्रश्न ये है  की क्या उनका पद बरक़रार रहेगा या पीयूष गोयल को वित्त मंत्री पद पर “नियमित” कर दिया जाएगा?

विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज ने इस बार लोकसभा चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया था. सुषमा फिलहाल लोकसभा एवं राज्यसभा किसी सदन की सदस्य नहीं हैं. कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की है. उन्हें इसका इनाम मिल सकता है. इसके अलावा वीके सिंह को भी प्रमुख मंत्रालय देना मजबूरी होगी क्योंकि वह गाजियाबाद से दूसरी बार भारी मतों से जीते हैं. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद भी वर्षों तक राज्यसभा सदस्य रहने के बाद पहली बार लोकसभा पहुंच रहे हैं. वह पहले भी प्रमुख मंत्रालय संभाल चुके हैं और इस बार भी उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकता है.

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