#फेक न्यूज़ : अपयश का प्रेत भी पीछा नहीं छोड़ता (भाग -1)

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            श्री राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार

केंद्र सरकार ने पत्रकारों से ग़लत ख़बर पर अधिस्वीकृति छीनने संबंधी सूचना प्रसारण मंत्रालय का परिपत्र वापस ले लिया | अच्छा किया | चुनाव के साल में इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था | पत्रकारों की अधिस्वीकृति वापस लेने का यह कोई वैधानिक आधार नहीं था | अगर इस आधार पर पत्रकारों को दण्डित करना ही था तो इसके लिए एक पूरी प्रक्रिया का पालन करना होता ,जो इतनी आसान नहीं थी | दिन भर देश भर के मीडिया सर्कल की हरारत और तपिश का पता लगाना सरकार के लिए कोई पेचीदा काम भी नहीं था | एडिटर्स गिल्ड और पत्रकारों के संगठनों की एकजुटता से एक और सन्देश सरकार को मिल गया है कि विज्ञापनों के दान से सब कुछ नहीं मिलता | बीते चार वर्षों में समाचारपत्रों और चैनल समूहों को उपकृत कर उनमें काम करने वाले पत्रकारों की भावना को ख़रीदना आसान नहीं है |

सवाल यह है कि फ़र्ज़ी ख़बर या ग़लत ख़बर कैसे सुनिश्चित हो ? एक नेता जी भाषण देते हैं या मीडिया में कुछ बोलते हैं | अगले दिन या तो मुकर जाते हैं या कहते हैं कि पत्रकारों ने उनकी बात को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है | क्या नेताजी के इस बयान के आधार पर कोई ख़बर ग़लत मान ली जानी चाहिए ? एक मुख्यमंत्री अपने राजनीतिक विरोधियों पर खुले आम भ्रष्टाचार के आरोप लगाएँ ,उनकी प्रतिष्ठा गिराएँ और बाद में माफ़ी मांग लें | मुख्यमंत्री की बात पर भरोसा करते हुए मीडिया उनके विरोधियों को भ्रष्ट लिखता या दिखाता है तो इस ग़लत ख़बर के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा | चुनाव प्रचार के दौरान बयानबाज़ी इतनी गंदी और मर्यादाहीन होने लगी है कि अगर कोई पार्टी कोर्ट में जाए तो सौ फ़ीसदी दंड होगा | यह बयानबाज़ी मीडिया दिखाता है,अख़बार छापते हैं तो इस ग़लत के लिए कौन ज़िम्मेदार है ?

जुलाई 1982 में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र तो अपने पर भ्रष्टाचार के आरोपों से इतने तैश में आए कि बिहार प्रेस बिल ले आए | वो तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के बारे में छप रही खबरों से भी उत्तेजित थे |  इसके प्रावधान भी बेहद खतरनाक थे | दो से पाँच साल तक की जेल हो सकती थी | देश भर के पत्रकार सड़कों पर उतर आए | आंदोलन हुए | दबाव यहाँ तक बढ़ा कि आलाकमान ने एक साल बाद 1983 में जगन्नाथ मिश्र को बिल की वापसी का निर्देश दिया |

इस साल अनेक विधानसभाओं और अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं | हम सब देखेंगे कि नेताओं की ज़बान से गंदगी निकलती है या फिर फूल झरते हैं | मीडिया वही दिखाएगा या छापेगा, जो बोला जाएगा | क्या इसका मतलब यह है कि अगले साल तक हिन्दुस्तान का सारा मीडिया बहुत सी ग़लत या फ़र्ज़ी ख़बरें दिखाने जा रहा है | इसका क्या इलाज़ है ? दंगों के दौरान मरने वालों की संख्या ,कारण ,अपराधियों की गिरफ़्तारी पर पुलिस या प्रशासन के बयान अक्सर ग़लत साबित होते रहे हैं | ऐसे में मीडिया किस पर भरोसा करे ? किसान आत्महत्याएँ करते हैं ,ग़रीब भूख से डीएम तोड़ते हैं लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में एक भी किसान क़र्ज़ से आत्महत्या नहीं करता ,एक भी ग़रीब भूख से नहीं मरता | इसका मतलब मीडिया की सारी ख़बरें फ़र्ज़ी थीं | नक्सलियों और डाकुओं से मुठभेड़ों की ख़बरों में अनेक तथ्य बाद में सच नहीं पाए जाते | ज़ाहिर है वे या तो बदल दिए जाते हैं या पहले छिपाए जाते हैं | मीडिया क्या करे ? भारत बंद में हुई हिंसा की जो कहानियाँ एक दो दिन दिखाई गई या प्रकाशित की गईं ,वे जांच के बाद काफ़ी हद तक बदल जाएँगी | क्या माना जाए कि मीडिया सिर्फ़ ग़लत ख़बरें ही दिखाता है | दरअसल यह अविश्वास की मानसिकता है |अनेक उदाहरण हैं कि विधायिका और कार्यपालिका मीडिया की खोजी और अन्वेषणात्मक नज़र को बर्दाश्त नहीं कर पाती | दोनों के हाथ में कार्रवाई का चाबुक होता है | वो पत्रकारों का उत्पीड़न करने पर आमादा हो जाती हैं | पत्रकारों को धमकाया जाता है ,मालिकों को विज्ञापन बंद करने की चेतावनी दी जाती है और उनके ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी मामले बनाए जाते हैं |

कोई दस्तावेज़ अतीत बन कर दफ़न नहीं हो जाता| दस्तावेज़ के साइड इफेक्ट्स भी सरकारों को बाद में झेलने पड़ते हैं

मुझे याद है कि जुलाई 1982 में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र तो अपने पर भ्रष्टाचार के आरोपों से इतने तैश में आए कि बिहार प्रेस बिल ले आए | वो तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के बारे में छप रही खबरों से भी उत्तेजित थे |  इसके प्रावधान भी बेहद खतरनाक थे | दो से पाँच साल तक की जेल हो सकती थी | देश भर के पत्रकार सड़कों पर उतर आए | आंदोलन हुए | दबाव यहाँ तक बढ़ा कि आलाकमान ने एक साल बाद 1983 में जगन्नाथ मिश्र को बिल की वापसी का निर्देश दिया | उस दौरान भी चुनाव एक डेढ़ साल बाद थे | कुछ इसी तरह प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार भी सितंबर 1988 में विवादास्पद मानहानि विधेयक लाइ थी | व्यापक विरोध के बाद उसे भी वापस लेना पड़ा था | उसके भी साल डेढ़ साल बाद चुनाव थे | इसके बाद राजस्थान सरकार का पिछले साल का प्रेस विरोधी अध्यादेश भी वसुंधरा सरकार को वापस लेना पड़ा था | यह भी लोकसेवकों ,मजिस्ट्रेटों और जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की ख़बरें रोकने से संबंधित था |

तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए कि इम्तिहान नज़दीक आने पर तैयारी के बजाए अनुचित तरीकों से परीक्षा पास करने की मानसिकता हमारे राजनीतिक दलों में बढ़ती जा रही है | क्या यह अर्थ लगाया जाए कि आलोचना स्वीकार करने का संयम अब चुकने लगा है और अपने ख़िलाफ़ कुछ भी छपने पर पत्रकार को निपटाने की सामंती मानसिकता सरकारों में पनप रही है | हाल ही में मध्यप्रदेश ,बिहार तथा देश के कुछ अन्य हिस्सों में पत्रकारों के उत्पीड़न की घटनाएं सामने आई हैं | केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने इसे बहुत सामान्य ढंग से लिया है | दो हज़ार अठारह के भारत में इसे कतई माफ़ नहीं किया जा सकता | सरकारों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि कोई फ़ैसला वापस लेने से नुक्सान की भरपाई हो जाती है | बिहार प्रेस बिल के अपयश का प्रेत अभी भी वयोवृद्ध जगन्नाथ मिश्र का पीछा नहीं छोड़ रहा है | कोई दस्तावेज़ अतीत बन कर दफ़न नहीं हो जाता| दस्तावेज़ के साइड इफेक्ट्स भी सरकारों को बाद में झेलने पड़ते हैं

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