#फेक न्यूज़ : अपयश का प्रेत भी पीछा नहीं छोड़ता (भाग -2)

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               श्री राजेश बदल, वरिष्ठ पत्रकार

क ज़माने में इंदौर को मिनी मुंबई कहा जाता था | हर फिल्म सारे देश से एक दिन पहले वहां रिलीज़ होती थी | इसका कारण यह था कि इंदौर में मराठी ,गुजराती,राजस्थानी ,मालवी और भरपूर संख्या में उत्तरप्रदेश से आए लोग बसे थे | उनकी रूचि में फिल्म चल गई तो यह अंदाज़ा लग जाता था कि संबंधित राज्यों में भी फिल्म के लिए संभावनाएँ हैं | फिर उसी हिसाब से वितरण नीति बनती थी | आप कह सकते हैं कि यह एक टेस्ट होता था समाज की नब्ज़ – दिलचस्पी टटोलने का | इसका आधार शायद राजाओं के ज़माने की परंपरा थी | राजा जब आम आदमी से जुड़ा कोई फैसला लेते थे तो उसके बारे में लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए रात को वेश बदलकर निकलते थे और जानकारी हासिल करते थे | फिर निर्वाचित सरकारों ने भी यही सिलसिला शुरू किया | इसे आज की भाषा में फीडबैक कहते हैं |

दरअसल जब जगन्नाथ मिश्रा ने बिहार प्रेस बिल पेश किया तो उसके पीछे यही मंशा थी | उन दिनों इंदिरागांधी और उनकी पुत्रवधू मेनका गांधी के बीच टकराव की ख़बरें बढ़ाचढ़ा कर मीडिया में छप रही थीं | देश के पहले परिवार की अन्तर्कथाएँ मसाले लगी होतीं थीं | प्रधानमंत्री इससे खुश नहीं थीं | उन्होंने सूचना प्रसारण मंत्री वसंत साठे को प्रेस से निपटने का फॉर्मूला खोजने को कहा | इसके बाद दिल्ली दरबार के भरोसेमंद क्षत्रप जगन्नाथ मिश्र को प्रेस विधेयक लाने का निर्देश दिया गया |

 

स्मृति ईरानी तो पुरानी और चतुर अभिनेत्री हैं | उन्हें पता है कि फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में पत्रकार अभिनेता -अभिनेत्रियों के बारे में कितना लिखते हैं और कोई चूँ -चपड़ भी नहीं करता |

इससे यह पता लगता कि वैचारिक रूप से बेहद सक्रिय खांटी हिंदी बेल्ट का यह राज्य क्या सोचता है और दो साल बाद होने वाले चुनाव में मीडिया कैसा व्यवहार करेगा | एक साल तक फीड बैक देखने के बाद विधेयक वापस ले लिया गया | यह अन्तर्कथा बताने के लिए जगन्नाथ मिश्र आज भी हमारे बीच मौजूद हैं |राजीव गांधी अपनी माँ की तरह कूटनीतिक और राजनीतिक दांवपेंच में  माहिर नहीं थे |उन्होंने एक राज्य से फीडबैक लेने के बजाए सीधे ही मानहानि विधेयक लाने का फ़ैसला किया | चुनाव से ठीक साल डेढ़ साल पहले |

कल सूचना प्रसारण मंत्रालय ने भी पत्रकारों को छोटी सी चिकोटी काट कर इस कार्रवाई के ज़रिए फीड बैक लेने का प्रयास किया था | स्मृति ईरानी तो पुरानी और चतुर अभिनेत्री हैं | उन्हें पता है कि फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में पत्रकार अभिनेता -अभिनेत्रियों के बारे में कितना लिखते हैं और कोई चूँ -चपड़ भी नहीं करता | इसलिए अपनी ओर से उन्होंने मीडिया को दण्डित करने का फॉर्मूला निकाला हो , वह भी चुनावी साल में – इस पर यक़ीन नहीं होता | बीते दिनों एक कथित संत से चुभने वाले सवालों के कारण भाई पुण्य प्रसून वाजपेयी को वह संस्थान छोड़ना पड़ा | इस कारण मीडिया के अंदर का  सोच पता लगाना और भी ज़रूरी था | बीते वर्षों में चैनलों और अखबारों में जिस तरह अपनी पसंद के चेहरे लाए गए ,उनका साइड इफेक्ट तो होना ही है | शायद इस फीडबैक के ज़रिए पता लग गया होगा कि पत्रकार बिरादरी संपादक या मुखिया के बदल जाने से नहीं बदल जाती | बहुमत आज भी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करने वाले ख़बरनवीसों का है |

सोशल मीडिया के मंचों पर आपने देखा होगा कि भले ही आप नेक नीयत से अपनी  बात रखें | अगर वह किसी दल या नेता के ख़िलाफ़ है तो तुरंत आपके ऊपर तीखे,भद्दे और अश्लील व्यंग्य बाणों की बौछार होने लग जाती है | घंटे भर में तो सारी दुनिया यह समझने लगती है कि आप ही ग़लत थे |

इसे आप भूल नहीं सकते कि आज सोशल मीडिया का दौर है | यह वरदान भी है और अभिशाप भी | संचार के इस नए अवतार को हर राजनेता एकदम समझ ले -यह संभव नहीं | इस कारण हम देखते हैं कि हर राजनीतिक दल के नेता ने कुछ बेरोज़गार नौजवानों को पच्चीस -तीस हज़ार रूपए में नौकरी पर रखा हुआ है | ये नौजवान राजनीतिक दाँवपेंच ,कूटनीति और इतिहास के तथ्यों से वाक़िफ़ नहीं होते | वे इशारा पाते ही प्रशंसा के पुल बाँध देते हैं या  निंदा का नाला खोल देते हैं | सोशल मीडिया के मंचों पर आपने देखा होगा कि भले ही आप नेक नीयत से अपनी  बात रखें | अगर वह किसी दल या नेता के ख़िलाफ़ है तो तुरंत आपके ऊपर तीखे,भद्दे और अश्लील व्यंग्य बाणों की बौछार होने लग जाती है | घंटे भर में तो सारी दुनिया यह समझने लगती है कि आप ही ग़लत थे | आप  माथा पीटने के अलावा कुछ नहीं कर सकते | आप कहते हैं -हे ईश्वर ! इन्हें माफ़ कर क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं | पर ये राजनेता ग़लतफ़हमी में हैं | यह एक ऐसा तीर है जो उलट कर उन्ही पर लग सकता है | बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट आई थी | एक युवक किसी राजनेता के यहां  काम कर रहा था | जब निंदा पुराण चरित्र हनन पर उतर आया तो उसने तीस हज़ार रूपए का जुआ उतार फेंका और मीडिया के मंच पर आकर नेताजी की पोल खोल दी |अब नेताजी सफाई देते फिर रहे हैं |उनपर कोई यक़ीन नहीं कर रहा |

भेड़िया आ चुका है और उन्हें बचाने कोई नहीं आ रहा है |

लब्बो लुआब यह कि असल में फेक न्यूज़ का उदगम तो सोशल मीडिया ही है | एक ख़बर फैला दीजिए | देखते ही देखते सांप्रदायिक उपद्रव शुरू हो जाएगा | बटन दबेगा दिल्ली से ,दंगा होगा टिमबक टू में | तो अब बंदर अपनी वाली पर उतर आया है | उस्तरा उसके हाथ में है | अपना गला काटेगा और आपका भी | चुनाव अगले साल हैं | ऐसे राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए यह खतरे की घंटी है | आप सामने वाले पर प्रहार करेंगे ,वह दोगुने वेग से आप पर प्रहार करेगा | आप सभी हमाम में खड़े हैं |हम तो दर्शक मात्र हैं | भारतीय लोकतंत्र के स्टेडियम में आपकी कुश्तियां अपने मनोरंजन के लिए देख रहे हैं | मूंगफली खाते हुए | इतने भी बेवकूफ़ नहीं हैं ,जितना समझा जा रहा है |

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