#Art: रंगों के साधक हैं चित्रकार अखिलेश.

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Pritpal Kaur, 6D Consulting Editor

नई दिल्ली, अखिलेश के रंग लोक में अनगिनत दरवाजे और खिड़कियाँ हैं. हम उनमें कहीं से भी प्रवेश कर सकते हैं और इत्मिनान से बने रह सकते हैं. उनके रंगाकार हमारे स्मृति लोक का हिस्सा बन जाते हैं– कुछ इस तरह कि उनके रंग नित नयी काया बदलते हुए हमारे भीतर अपना एक गहरा संसार रचते चले जाते हैं.

अखिलेश रंगों को किसी साधक की तरह बरतते हैं. शायद इसलिए कि रंग कोई भी हो ( उन्हें किसी भी रंग से कोई परहेज़ नही रहा) उनके चित्रों में आ कर वह अखिलेश-मय हो जाता है.

उनके रंग लोक में जो आकृतियाँ और ज्यामितीय आकार हैं, वे भी रंगों की  सजीव देह से जनमते है और रंगों के समानांतर उनकी बढ़त अनवरत जारी रहती है.

ये चित्र रूप और संरचना में अपनी समस्त तक्लीनी सीमाओं से ऊपर उठ कर एक अनुभव की तरह हमसे मुखातिब होते हैं. यहाँ हम महसूस कर सकते हैं– रंगों की दैहिकता, रंगों की अलौकिक  ऊष्मा.

इस दैहिकता, इस ऊष्मा का सम्बन्ध एन्द्रिक मांसलता से भी है. लेकिन यहाँ किसी पल वह अद्वितीयता भी घटित हो रही है, जिसे ‘रूप आध्यात्म’ के रूप में देखा जाता रहा है.

बचपन से महान चित्रकारों रज़ा साहेब, हुसैन साहेब का घर में आना जाना था. हुसैन साहब तो घर के पीछे ही रहते थे. मगर उम्र के अट्ठारहवें वर्ष तक अखिलेश को पेंटिंग बनाने में कोई रुचि नहीं थी.

के हमारे भीतर अपने अस्तित्व की सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ कौंधते हैं. हर बार ये कौंध एक नए भावबोध, एक नयी अनुभूति के साथ घटित होती है.

अखिलेश के ये चित्र हमारी अनुभूतियों का नवाचार करते हैं.

उनकी कला अनुभूति के नवाचार की कला है.

ये रंगकार हमारे चेतन, अर्धचेतन, अवचेतन में स्थाई रूप से बस सकने को अनायास ही संभव बनाते है.  हमारी स्मृतियों का विस्तार करते हुए हमारी ‘विजुअल  मेमोरी’ का हिस्सा बन जाते हैं.

अखिलेश कला में अमूर्त, आकृति-मूलक, यथार्थवाद या फिर समकालीनता, आधुनिकता, आदिवासी और लोक कला सरीखे भेदों को खारिज कर गहरे आत्मविश्वास के साथ कहते है— “एक अच्छा चित्र सभी को आकर्षित करता है. वह मनुष्य को संबोधित करता है न कि विचारधारा को या ज्ञान को या फिर मनुष्य के छोटेपन को.”

आज जब अधिकाँश कलाएं इकहरी होने को अभिशप्त हैं. ऐसे समय में प्रचलित धारा के विरुद्ध अपनी कला और अपने कला चिंतन के ज़रिये अखिलेश प्रतिपक्ष रचते हैं.

वे न केवल कलाओं में हर तरह के सामान्यी-करण का मुखर प्रतिकार करते हैं बल्कि रूढ़िवादी दृष्टि और सतही, सामान्यीकृत मुहावरों से कला के सवालों और चिंताओं को देखने-जांचने से भी परहेज़ करते हैं.

यह लेखक अभिषेक कश्यप पुस्तक ‘ कलाकार का देखना’ के कुछ अंश है.

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