सब को साथ ले कर चलने में यकीन रखते थे अटल जी

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प्रितपाल कौर, सलाहकार सम्पादक, 6डी

नई दिल्ली, वे देश के जाने-माने कवि थे. वे देश के जनमान्य नेता थे. वे तीन बार देश के प्रधान मंत्री रहे.  एक बार तेरह दिन के लिए, दूसरी बार तेरह महीनों के लिए और तीसरी बार पूरी पारी खेली. उनके बारे में देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भविष्य वाणी की थी कि वे एक दिन भारत के प्रधान मंत्री ज़रूर बनेंगे. 

आप पहचान ही गए होंगें कि हम बात कर रहे हैं स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की. उनको जानने वाले और निजी तौर पर नहीं जानने वाले भी अटल जी की बेहद इज्ज़त करते थे. भारतीय राजनीति में शायद वे इकलौते ऐसा दक्षिणपंथी नेता रहे जिनके बारे में कहा जाता है कि वे बेहद उदारवादी विचारधारा रखते थे और सब को साथ ले कर चलने में यकीन रखते थे. 

२५ दिसंबर १९२४ ग्वालियर में पैदा हुए अटल जी दस बार लोक सभा सांसद चुने गए और दो बार राज्य सभा सांसद हुए. १९५१ में जब भारतीय जनसंघ का गठन हुया तो वे इसके संस्थापक सदस्यों में से एक थे. १९६८ में दीन दयाल उपाध्याय की रहस्यमय हत्या के बाद वे पार्टी के अध्यक्ष बने.  भारत छोडो आन्दोलन का वक़्त इन्होनें अँगरेज़ सरकार को एक माफीनामाँ लिख कर दिया था जिसमें इन्होनें इस आन्दोलन में शामिल न होने की बात कही थी.

वाजपयी जी के कार्य-काल में फ्री और फेयर चुनाव हुए थे कश्मीर में

 अटल जी के कार्यकाल में ही आई सी ८१४ के अपहरण की घटना हुयी और सरकार ने आतंकवादियों के आगे घुटने टेक दिए. खुद जसवंत सिंह आतंकवादी मसूद अजहर को अपने साथ विमान में कंधार ले कर गए और अपहृत यात्रियों को आतंकवादियों के कब्ज़े से छुड्वाया. अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद अटल जी ने अपने भाषण में कहा था कि वहां नुकीले पत्थर निकले हैं. उन पर तो कोई बैठ नहीं सकता. ज़मीन तो समतल करनी ही होगी. उसे बैठने लायक तो बनाना ही होगा. तभी भजन पूजन हो सकता है. 

पोखरण-२ परमाणु परीक्षण जब अटल जी के कार्यकाल में किया गया तो कहा यही गया कि उन्होंने  पार्टी के कट्टरपंथियों के दबाव में आ कर यह कदम उठाया. इससे शेह पा कर पाकिस्तान ने अपना परमाणु परीक्षण किया जो कि पूरी तरह से नाजायज़ था. और इस परीक्षण के बाद दोनों देशों के सम्बन्ध और भी ज्यादा खराब हो गए.  जबकि गृह मंत्री अडवाणी ने बयान दिया था कि इससे कश्मीर समस्या को सुलझाने में मदद मिलेगी. कालांतर में यह काफी बचकाना ख्याल साबित हुया. जब इसके बाद दोनों देशों में तनाव और बढ़ गया. 

एक वीडियो अक्सर देखा और दिखाया जाता है जिसमें वर्तमान प्रधान मंत्री और तत्कालीन मुख्य मंत्री (गुजरात) नरेन्द्र मोदी उनकी बगल में बैठे हैं और तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपयी गुजरात दंगों पर बयान देते हुए कह रहे हैं कि शासक के लिए प्रजा प्रजा में भेद नहीं हो सकता. धर्म, जाती, सम्प्रदाय; किसी भी आधार पर. उसे तो राजधर्म निभाना चाहिए.  इस पर नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि साहब यही तो हम कर रहे हैं. इस वार्तालाप की जो भाव भंगिमा और बॉडी लैंग्वेज है उस पर कई तरह के कयास, अटकलें और बयानबाजी होती रही है और शायद आगे भी होती रहेगी. शायद वाजपेयी इन आरोपों से खुद को कभी भी पूरी तरह से ख़ारिज न करवा पायें मगर ये वही वाजपयी हैं जिनके कार्य-काल में कश्मीर में फ्री और फेयर चुनाव हुए थे. 

 वे सही मायनों में एक सच्चे स्टेट्स मैन थे. उनकी ह्मेशा यही कोशिश रही की पाकिस्तान के  साथ भारत के सम्बन्ध बेहतर हों. उन्होंने शालीनता के साथ पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार किया था. उनके यहाँ अहम् नहीं था. वे जीवन पर्यंत सब को साथ ले कर चलने की कोशिश में लगे रहे. 

अपने युवा कला में वे आरएसएस की शाखाओं में जाते थे. मगर साथ ही वे दक्षिण पंथ के इकलौते उदार वादी नेता भी कहलाये.  वे कांग्रेस के कई नेताओं से बहुत प्रभावित रहे.  उनकी शालीनता को वे अपने वयवहार में लाते थे. खुद पंडित नेहरु ने उस समय के संयुक्त राष्ट्र में भारतीय अधिकारी श्री रसगोत्रा से कहा था कि अटल जी को दुनिया के जितने ज्यादा नेताओं से मिला सकते हैं मिलाया जाए. ताकि उनके व्यक्तित्व का विस्तार हो.  

अटल जी के दिल में किसी के भी लिए नफरत नहीं थी. उनके निजी जीवन के बारे में भी सिर्फ इतना ही कहा जाता है कि वे अपने कॉलेज के समय के प्रेम को नहीं पा सके तो जीवन भर अविवाहित रहने का संकल्प लिया और राजनीति में कूद पड़े. ये दीगर बात है की वही राजकुमारी कौल बाद में विवाहिता होते हुए भी जीवन के उतरार्ध में उनके जीवन में आयीं और अपनी मृत्यु तक उनका साथ निभाया. एक पुत्री को वाजपेयी जी ने गोद लिया और उसी ने उन्हें मुखाग्नि दे कर उनकी अंतिम यात्रा को सुगम किया. 

हमारी 6dnews.com टीम की तरफ से एक सच्चे देशभक्त और देशप्रेमी कवि-नेता को विनम्र श्रधांजलि 

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