कहीं आमरस बिगाड़ न दे आपके स्वास्थ्य का जायका

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मुंबई। शहरी साहब थोड़ा सावधान हो जाइए। आप आम और आमरस के दीवाने हैं तो थोड़ा सेहत का भी ध्यान रखिए। कहीं स्वाद के चक्कर में आपके स्वास्थ्य का जायका न बिगड़ जाए। यह हम नहीं कह रहे बल्कि निष्कर्ष खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) का है।
एफडीए ने किया सावधान
इन दिनों आमरस की बड़ी मांग है, साथ ही बाजार में आम भी बिक रहे हैं। एफडीए ने सावधान किया है कि अप्रमाणित आमरस न खाएं क्योंकि बड़े पैमाने पर दुकानों पर केमिकल से बने आमरस बिक रहें हैं, जो आपकी सेहत के लिए बेहद हानिकारक हैं। एफडीए सूत्रों की मानें तो रसायनों से बने आमरस के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की योजना बनाई गई है। इस बीच कई दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है। महानगर की कई दुकानों में आमरस बंद प्लास्टिक थैलियों में 60 से लेकर 100 रुपए की दर पर बेचें जा रहें हैं। इनका मेडिकल पैमाना तय नहीं हैं।
इन आमरस को रासायनिक पदार्थों के साथ मिलाकर बनाया जाता है। एफडीए की ओर से अनुचित घटना को रोकने के लिए कई जगहों से नमूने भी लिए जा रहे हैं। जहां खतरनाक रसायनिक आमरस मिल रहें हैं, उन दुकानदारों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। एफडीए की ओर से हाल में विजय स्टोर्स, राज इंडस्ट्रियल एस्टेट ( मुलुंड) में छापा मारकर कार्रवाई की गई है। यहां से 8 लाख 87 हजार रुपए की राशि के 3 हजार 425 किलोग्राम आमरस की खेप जब्त की गई है। जब्त रस के नमूने निरीक्षण के लिए भेजे गए हैं। कानूनन रासायनिक पदार्थ की मिलावट पर 5 लाख रुपए जुर्माना और कारावास की सजा हो सकती है। 
 
एफडीए के सहायक आयुक्त शैलेश जाधव के मुताबिक यदि अच्छी कंपनी की पैकेजिंग सामग्री वाले आमरस की खरीदी की जाए तो वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होगा। उन्होंने बताया कि ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए कम लागत में अधिक रस बनाया जाता है। इसके लिए कुछ रसायनों का उपयोग किया जाता है। ये रसायन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होते हैं। कार्बाइड से पकाए गए आमों के व्यापारियों पर भी पैनी नजर रखी जा रही है।
कार्बाइड से फलों को पकाना प्रतिबंधित है, बावजूद इसका धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। इसके अलावा हाल के वर्षों में आम और अन्य फलों को पकाने के लिए चाइनीज पुडिय़ा का प्रचलन भी तेजी से बढ़ा है। यह पुडिय़ा सेहत के लिए खतरनाक है। इसे पानी में भिगोने पर इथीलीन गैस निकलती है. जो सेहत के लिए खतरनाक है। हालांकि इस पर अभी शोध जारी है। ग्रामीण अंचलों पर गौर करें तो पेड़ से पके फल या पारंपरिक
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