यू.जी.सी. को ख़त्म करने की पहल, शिक्षाविदों का विरोध !

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नई दिल्ली, देश की आज़ादी के बाद से भारत की उच्च शिक्षा के मापदंडों को निर्धारित करने वाली सर्वोच्च शिक्षण संस्था यू.जी.सी. का शतर जल्द ही गिरने वाला है. केंद्र की भाजपा सरकार को अब   यू.जी.सी. अब बेकार लगने लगी है. हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने घोषणा की कि देश के सभी विश्वविद्यालयों को मान्यता देने वाले सर्वोच्च संस्था यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी) आने वाले समय में खत्म हो जाएगी और केंद्र सरकार यूजीसी की जगह हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया (HECI) लाएगी। इसबीच, शिक्षाविदों ने यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (यूजीसी) को स्क्रैप करने के लिए केंद्र द्वारा उठाए गए कदम पर सवाल उठाया है और कहा है कि राजनेताओं को अकादमिक मामलों में शामिल नहीं होना चाहिए।

शिक्षाविदों ने यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (यूजीसी) को स्क्रैप करने के लिए केंद्र द्वारा उठाए गए कदम पर सवाल उठाया है और कहा है कि राजनेताओं को अकादमिक मामलों में शामिल नहीं होना चाहिए। अगर कोई  इस मसौदे के लिए अपनी राय देना चाहते है तो 7 जुलाई शाम 5 बजे तक अपनी राय ईमेल के जरिए दे सकते है। आप अपनी राय देने के लिए reformofugc@gmail.com पर दे सकते है।

अभी हाल ही में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि यूजीसी की जगह HECI को स्थापित किया जाएगा और इसके अधिनियम का मसौदा तैयार कर लिया गया है। आपको बता दें कि केंद्र सरकार HECI को लागू करके यूजीसी एक्ट-1956 को खत्म करना चाहती है। सरकार ने इसके लिए जनता से भी राय मांगी है। नए अधिनियम के मसौदे को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है।वहीं प्रस्तावित हायर एजुकेशन कमिशन ऑफ इंडिया (HECI) में 12 सदस्य होने की बात कही गई है जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा।

हालांकि इसमें चेयरपर्सन और वाइस चेयरपर्सन जैसे पदों को शामिल नही किया जाएगा। इन 12 सदस्यों में हायर एजुकेशन, मिनिस्ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट और डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सचिवों को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा AICTE और NCTE के चेयरपर्सन और दो वर्किंग वाइस चांसलरों को भी शामिल किया जाएगा। वेबसाइट पर अपलोड किए गये मसौदे के अनुसार HECI का काम न सिर्फ शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा देना है बल्कि शैक्षिक मानकों को बनाए रखना, उच्च शिक्षा के शिक्षण, मूल्यांकन और अनुसंधान के लिए मानक तय करना होगा। अगर अगर कोई  इस मसौदे के लिए अपनी राय देना चाहते है तो 7 जुलाई शाम 5 बजे तक अपनी राय ईमेल के जरिए दे सकते है। आप अपनी राय देने के लिए reformofugc@gmail.com पर दे सकते है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने भी ट्वीट के जरिए लोगों से राय देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि ‘मसौदा अधिनियम सरकार द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों को और आजादी देने वाले तंत्र को सुधारने के वादे के तहत तैयार किया गया है, जिससे शिक्षा तंत्र की उत्कृष्टता और समग्र विकास की सुविधा को बढ़ावा दिया जा सके।’ उन्होंने आगे बताया कि ‘नियामक तंत्र में परिवर्तन, न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन, अनुदान कार्यों को अलग करने, निरीक्षण राज का अंत करने, अकादमिक गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करने और लागू करने की शक्तियों के सिद्धांत पर आधारित है।’

शिक्षविदों ने किया विरोध 

इसबीच, शिक्षाविदों ने यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (यूजीसी) को स्क्रैप करने के लिए केंद्र द्वारा उठाए गए कदम पर सवाल उठाया है और कहा है कि राजनेताओं को अकादमिक मामलों में शामिल नहीं होना चाहिए। केंद्र का ये क़दम शिक्षाविदों को नागवार गुज़र रहा है. उन्होंने शैक्षणिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश करने के लिए केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है.

पूर्व यूजीसी अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोरातका कहना है कि, “जब मंत्रालय कहता है कि यह वित्त पोषण का प्रभार वह लेगा,वही ये स्पष्ट नहीं है किवित्त पोषण से संबंधित प्रशासनिक कार्य भी मंत्रालय द्वारा किया जाएगा या फिर ये नये निकाय द्वारा किया जाएगा। दोनों ही मामलों में, यह सलाह नहीं दी जा सकती है कि मंत्रालय वित्त पोषण को नियंत्रित करे. बेहतर यही होगा की नियामक निकाय ही फ़ंड जारी करे, क्योंकि वित्त पोषण अकादमिक अभ्यास पर आधारित होता है और वे इसके उपयोग की निगरानी कर सकते हैं।

“और मुझे लगता है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसे संस्थान के स्वायत्त चरित्र को बनाए रखा जाना चाहिए। मसौदा कानून स्वायत्तता के महत्व को तो मान्यता देता है, लेकिन यहाँ सिर्फ़ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का सवाल नहीं है, यह आयोग की भी स्वायत्तता का सवाल है” ।

जेएनयू की प्रो. आयशा किडवाई, का कहना है कि,”यह स्पष्ट है कि नए मानदंडों के अनुसार, नए विश्वविध्यालयों को अधिकार न केवल वर्तमान में उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर दिया अनुमति दी जाएगी बल्कि नए प्राधिकरण द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने पर भी आधारित होगा. इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का बोझ निश्चित रूप से फीस और भर्ती में कटौती के रूप में सामने आएगाऔर सबसे अधिक संभावना है कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए नए-पुराने विश्वविध्यालय सभी प्रकार के बकवास और अल्पकालिक पाठ्यक्रमों को शामिल करने को मजबूर हो जाएँगे. है। इसका मतलब है पुराने और नए विश्वविद्यालयों दोनों को केंद्र के आदेशों का पालन आदेश पारित होते ही करना पड़ेगा। ”

प्रसिद्ध शिक्षविद जयप्रकाश गांधी का भय है कि, “नए प्प्राधिकरण की संरचना ऐसी है कि शिक्षा के संबंध में होने वाले निर्णयों में राजनीतिक दलों की हस्तक्षेप बढ़ जाएगी जबकि ये फ़ैसले आदर्श रूप से शिक्षाविदों और अनुभवी शिक्षाविदों के एक समूह द्वारा किया जाना चाहिए ताकि देश को आगे ले जाया जा सके.”

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