किसान आंदोलन की सफलता का राज़ !

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 मुंबई- नाशिक से मुंबई तक निकाले गए किसानों के लांग मार्च को अभूतपूर्व सफलता मिली। हर कोई इस बात को लेकर उत्सुक है कि आखिर इस एतिहासिक आंदोलन को इतनी बड़ी सफलता मिलने के पीछे कौन सा रहस्य है। आंदोलन में न कहीं हिंसा हुई, न गंदगी और नहीं कोई सार्वजनिक व्यवस्था में खलल। सालीनता और अनुशासन के दायरे में रहकर किसानों ने अपनी अधिकांश मांगें मनवाने पर सरकार को मजबूर कर दिया। सही मायने में सफल आंदोलन का श्रेय अखिल भारतीय किसान सभा को जाता है, जिन्होंने योजनाबद्ध तरीके से रणनीति बनाई और अपने मकसद में कामयाब रहे। किसान सभा ने इस आंदोलन की तैयारी केवल 20 दिनों में की थी। किसान आंदोलन का अगला पड़ाव दिल्ली है, जहां देशव्यापी आंदोलन की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। किसान नेताओं का दावा है, उनका देशव्यापी आंदोलन भी सफल होगा और इतिहास के पन्नों में जगह बनाएगा।

– अभी ठंडी नहीं हुई है, आंदोलन की आग, 9 अगस्त को देशव्यापी आंदोलन की तैयारी

अखिल भारतीय किसान सभा ने 9 अगस्त 2018 ( भारत छोड़ो आंदोलन दिवस) को पूरे देश में आंदोलन छेड़ने का फैसला किया है। मुख्य आंदोलन दिल्ली में होगा। आंदोलन की पूर्व तैयारियां जोर-शोर से शुरू कर दी गई हैं। शेष बची मांगों को पूरा करने के लिए देश के कोने-कोने में जाकर 10 करोड़ किसानों के हस्ताक्षर जुटाए जाएंगे। देश के हर जिला मुख्यालय पर 9 अगस्त को किसान प्रदर्शन करेंगे। किसानों का मांग पत्र जिलाधिकारियों के मार्फत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपा जाएगा। इससे पहले इसी महीने की 6 तारीख को नाशिक से 25 हजार किसानों का हुजूम विधानभवन का घेराव करने पैदल निकला था। जैसे-जैसे लांगमार्च आगे बढ़ते गया किसानों की संख्या बढ़ती चली गई। आखिरी पड़ाव मुंबई के आजाद मैदान में 12 तारीख की भोर में किसान पहुंचे थे, जहां उनकी संख्या 50 हजार से अधिक हो गई थी। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाएं और बुजुर्ग किसान भी शामिल थे। इतने बड़ी संख्या में पहुंचे किसानों को देखकर अनुमान लगाया जा रहा था कि मुंबई की कानून व्यवस्था और परिवहन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाएगी, लेकिन अन्नदाताओं की प्रशंसा करने होगी, उन्होंने इस पर आंच तक नहीं आने दी। सबसे ज्यादा प्रशंसा इस बात को लेकर हो रही है कि मुंबई की ट्राफिक व्यवस्था में कही खलल नहीं पड़ी और बोर्ड परीक्षा दे रहे विद्यार्थियों को कहीं भी परेशानी नहीं हुई। विद्यार्थियों का

कहीं साल बर्बाद न हो जाए, इसके लिए किसानों ने 11 मार्च की रात को ही सोमैया ग्राउंड से आजाद मैदान के लिए कूच कर दिया। किसानों ने अपने स्वास्थ्य और थकान की परवाह नहीं की। अपना पेट काटकर दूसरों की भूख मिटाने वाले अन्नदाताओं के अनुशासन, अहिंसा और स्वच्छता की हर कोई प्रशंसा कर रहा है।

कैसे हुई तैयारी

दरअसल भोले-भाले और मेहनतकश किसानों को एकजुट और अनुशासन के दायरे में रखने के लिए अखिल भारतीय किसान सभा के दिशा-निर्देश पर महाराष्ट्र प्रदेश इकाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वैसे तो पिछले दो साल से योजनाबद्ध तरीके से अलग-अलग चरणों में किसानों के कई आंदोलन हुए। इससे पहले मार्च 2016 को नाशिक में और पालघर के वाडा में अक्टूबर 2016 को किसानों के दो बड़े आंदोलन हुए थे। विधानभवन घेराव करने का फैसला महाराष्ट्र किसान सभा ने 16 फरवरी को सांगली में हुई बैठक में लिया था। मात्र 20 दिनों में नाशिक से मुंबई तक लांग मार्च निकालने की जोरदार तैयारियां की गई । संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं को क्षेत्रवार जिम्मेदारियां सौंपी गई। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अशोक ढवले, पूर्व अध्यक्ष जेपी गावित, महाराष्ट्र इकाई के प्रदेश अध्यक्ष किसन गुजर और प्रदेश महासचिव डॉ. अजित नवले ने पूरी कमान संभाल रखी थी। किसान सभा के पदाधिकारियों ने गांव-गांव और कस्बे-कस्बे जाकर किसानों के साथ बैठकें और छोटी-छोटी सभाएं की। पर्चे बांटे गए और सभी पहलुओं पर अध्ययन किया गया। महिलाओं, बुजुर्गों और युवा किसानों के अच्छी तरह से समझाया गया कि उन्हें किस तरह आंदोलन में हिस्सा लेना है और क्या करना है। किसान सभा के नेता यह समझाने में कामयाब रहे कि यह आंदोलन सिर्फ उनका है। किसान इस बात को लेकर भी राजी हो गए थे कि वे अपनी व्यवस्था साथ लेकर चलेंगे। किसानों को किसी भी प्रकार का लालच या पैसे का प्रलोभन नहीं दिया गया। किसानों ने खुद उत्साहित होकर इस आंदोलन में हिस्सा में लिया। लांग मार्च के दौरान एक हजार से अधिक कार्यकर्ताओं की टीम अलग-अलग जिम्मेदारियां लेकर काम कर रही थी।

एतिहासिक संघर्ष के आगे झुकी सरकार
अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. सुधीर ढवले की मानें तो संगठन ने केवल पानी के टैंकर किराए पर लिए थे और एक एंबुलेंस की व्यवस्था की गई थी। एंबुलेंस में विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम तैनात थी। किसान खुद अपने घर से राशन लाए थे। जहां हम हमारा ठहराव होता था, वहां किसान खुद भोजन बनाकर खाते थे। साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखने के बाद ही हम आगे के लिए निकलते थे। ढवले ने बताया कि हमें माकपा का समर्थन प्राप्त था। भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों और संगठनों ने हमें सर्मथन दिया। मोर्चे की सफलता को देखते हुए आखिर में महाराष्ट्र सरकार को झुकना पड़ा और राज्य के मुख्य सचिव के हस्ताक्षरवाला लिखित आश्वासन दिया गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हमारी कौन-कौन सी मांगें मानी गई हैं, उसकी जानकारी विधानसभा में भी दी है। इससे पहले हमें केवल गुमराह किया जाता रहा है। यह हमारा एतिहासिक संघर्ष था। महाराष्ट्र सरकार ने अपने अधीन हमारी 80 फीसदी मांगें मान ली हैं। शेष बची 20 प्रतिशत मांग राज्य सरकार के दायरे में नहीं है। बाकी बची मांगें केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं, जिसमें रंगनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने, किसानों की उपज का वाजिब समर्थन मूल्य और पूरे देश में किसान कर्जमाफी जैसी प्रमुख मांग शामिल है। ढवले के मुताबिक शेष बची मांगों के संबंध में बीते सोमवार को दिल्ली में हमारी बैठक हुई। हमने देशव्यापी आंदोलन छेड़ने का फैसला लिया है।

क्या थी मांगें
किसानों की प्रमुख मांगों में रंगनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने, जंगल और जमीन कानून लागू करने, आदिवासियों के नाम जमीन करने, किसानों को उपज का वाजिब समर्थन मूल्य, पूरे देश में किसान कर्ज माफी, महाराष्ट्र में किसान कर्जमाफी की शर्ते शिथिल करने, किसानों की जमीन जबरन न लेने, खराब ऱाशनकार्ड बदलने, जमीन का अधिकार, राशन दुकानों से मिलनेवाले अनाज की गुणवत्ता, किसानों को डेढ़ गुना लागत खर्च देने, पेंशन योजना, राज्य का पानी राज्य को जैसी कई प्रमुख मांगे थी।

कौन सी मांगें हुई पूरी
मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार राज्य में 2001 से 2009 तक के बकाया खाताधारकों को, जो वर्ष 2008 की कर्जमाफी योजना से वंचित रह गए हैं, उन्हे भी नई कर्ज माफी योजना में शामिल किया जाएगा। वन अधिकार कानून पर अमल करते हुए लंबित सभी दावों और अपीलों का छह महीने में निपटारा किया जाएगा। आगामी मानसून सत्र तक प्रत्यक्ष कब्जा जमीन अनुसूचित जाति और आदिवासियों के नाम की जाएगी। नारपार, दमनगंगा, वाघ एवं पिंजाल, इन नदियों के घाटी का अरब सागर में बहकर जानेवाला पानी रोका जाएगा। गिरणा और गोदावरी घाटी में पानी घुमाने के मामले में केंद्र सरकार के राष्ट्रीय जल विकास प्राधिकरण की रिपोर्ट तैयार की है। इस संबंध में किए जानेवाला करार का मसौदा दि. 22 सितंबर 2017 को केंद्र सरकार को दिया गया है। समझौते के अनुसार इस घाटी का महाराष्ट्र के हिस्से का पानी, महाराष्ट्र में रोका जाएगा। कलवण, मुरगांव क्षेत्र की 31 लघुबांध परियोजना और कोल्हापुर बांध की उपयोगिता जांच कर, उनका परियोजना मे समावेश किया जाएगा।

देवस्थान इनाम वर्ग 3, चारागाह, बेनामी जैसी जमीनों के संबंध में नियुक्त की गई समिति की रिपोर्ट अप्रैल 2018 तक मंगाकर, अगले दो महीने में नीतिगत निर्णय लिया जाएगा। कर्जमाफी का पति और पत्नी दोनों को लाभ। कर्ज माफी योजना की गठित होनेवाली समिति में किसान प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। फसल कर्ज के साथ मुद्दत कर्ज का भी समावेश। किसानों को कर्जमाफी के लिए 31 मार्च 2018 तक नया आवेदन करने का मौका दिया गया है। दूध का भाव 70:30 अनुपात के अनुसार सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र बैठक बुलाई जाएगी। राज्य कृषि मूल्य आयोग का गठन करके समर्थन मूल्य देने के संदर्भ में कार्यवाही की जाएगी। गन्ना दर नियंत्रण समिति का भी गठन किया जाएगा। जीर्ण राशनकार्ड को बदलने और संयुक्त राशनकार्ड को अलग करने की मांग पर आगामी छह महीने में कार्यवाही पूरी की जाएगी। राशन दुकानों में अनाज मिलता है या नहीं इस संबंध में विभाग के सचिव खुद शिकायतों की जांच करेंगे। विकास परियोजनाओं के लिए किसानों की जमीन जबरन नहीं ली जाएगी। बोंडअली और ओलावृष्टि प्रभावितों को नुकसान भरपाई का आवंटन शुरू कर दिया गया है। बेहद जरूरी सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए लगनेवाली भूमि अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा के प्रस्ताव की शर्त को स्थगित कर दिया गया है।

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