मोटापे पर यह पढ़ लें, आप अगला गुलाब जामुन नहीं खाएंगे

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सवाल उठते हैं कि क्यों दुनिया की बड़ी आबादी मोटापे का शिकार है?

यह माना जाता है कि लोग जितना खाते हैं, उतनी मेहनत नहीं करते हैं।

इस विचार के चलते ही लोगों के खानपान का तरीका बदल गया था।

इसके चलते एक नया ही उद्योग खड़ा हो गया – डायट फूड उद्योग।

रेशों से भरे आहार, कम कैलोरी वाले भोजन से कसरत करवाने वाले या चाय पीकर मोटापा घटाने का कारोबार चल पड़ा।

 

आपको कैसा लगेगा यह जानकर कि यह अवरधारणा ही गलत थी?

विज्ञान लेखक और पुस्तक द केस अगेंस्ट शुगर के लेखक गैरी ट्यूब्स का कहना है कि ये जानकारी भ्रामक है।

इसमें सबसे गलत यह है कि यह धारणा भोजन की शक्ति के खिलाफ है।

अलग-अलग भोजन पर शरीर भी अलग-अलग तरह से काम करता है।

शक्कर के मामले में मोटापे को लेकर धारणा भी बहुत गलत है।

 

अमरीका का नेशनल इंस्टूट्यूट ऑफ डायबीटीज एंड डाईजेशन एंड किडनी डीजीज का कहा है कि शीतल पेय और टॉफी-टॉकलेट की शक्कर को लीवर खर्च करता है।

शक्कर जरूरत से अधिक हो जाए, जिसे खर्चने में लीवर अक्षम रहे, तो वह चर्बी में बदल जाती है।

इसके कारण लीवर में चर्बी जमा होती है और यही इंसूलीन रेसिस्टेंस का कारण बनता है।

इंसूलीन रेसिस्टेंस के कारण शरीर के मसल्स, चर्बी और लीवर सेल्स इंसूलीन से प्रतिक्रिया नहीं करते हैं।

इसके कारण रक्त की शक्कर ये सोख नहीं पाते हैं।

 

एक और भ्रांती है कि शक्कर वह तत्व है जो दिमाग को सोचने पर मजबूर करता है कि भूख लगी है।

इसी के चलते हम खाना खाने लगते हैं, खाते ही जाते हैं।

 

अब कहा जा रहा है कि मोटे लोगों के साथ हम बहुत गलत व्यवहार करते हैं।

हमने धारणा बना रखी है मोटे लोग आलसी, कम इच्छाशक्ति वाले और मूर्ख होते हैं।

उनके इलाज के नाम पर हम उन पर खूब अत्याचार करते हैं।

हम उनके साथ गलत करते हैं – खासतौर पर खूब कसरत और भूखा मारते हैं।

 

न्यूयॉर्क टाईम्स की रपट के मुताबिक 2015 में कोकाकोला ने वैज्ञानिकों को मोटी रकम दी ताकी वे बताएं कि मोटापे से बचाव हेतु कम कैलोरी नहीं लें, कसरत करें।

यह जानकारी भी असल में सच कम, बहकाने वाली ही अधिक थी।

 

इस सिलसिले में अभी और शोध की जरूरत है।
ट्यूब का मानना है कि हम यह तय करें कि हम क्या और कितना खाएं तो भी मोटापे से हमारा बचाव हो सकता है।

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