बांग्लादेश को आज़ादी दिलाने के लिए मुक्तिवाहिनी को इन्होंने दी थी ट्रेनिंग

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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार

भोपाल, रमेश किशोर अग्निहोत्री अब नहीं हैं। तेरह दिन पहले उन्होंने ख़ामोशी के साथ हमारे बीच से विदाई ले ली । क़रीब नब्बे साल की उनकी ज़िंदगी के अनेक अध्याय हमें नहीं मालूम । पर उनके संपर्क में जितना भी मुझे पता चला वह आपसे साझा करना चाहता हूँ । एक सदी के सफ़र में अपनी ज़िंदगी की किताब में ढेर सारे अनुभव समेटे अग्निहोत्रीजी ने जब इस जहां को अलविदा कहा तो एक बड़ा पुस्तकालय भी उनके साथ चला गया।

मैं नहीं जानता कि आपमें से कितने लोग अग्निहोतरजी को जानते थे। विडंबना है कि हमारे बीच से इस तरह आधुनिक भारत के प्रामाणिक इतिहास को समेटे लोग इस तरह एक एक करके जा रहे हैं और हम अतीत के इन दुर्लभ दस्तावेज़ों को सहेजने और उन्हें नई नस्लों तक पहुँचाने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं।पश्चिमऔर योरप केअनेक छोटे छोटे देशों की हम नक़ल करते हैं , लेकिन उनसे यह नहीं सीखते कि अपने इतिहास पुरखों के पास मौजूद जानकारियों का ख़ज़ाना किस तरह सँभाल कर रखा जाए।

एक संस्थान के बिना भी जीने वाला हिन्दुस्तान

तो बातअग्निहोत्रीजी की।देश की आज़ादी,राष्ट्रपिता महात्मागाँधी की हत्याऔर पाकिस्तान का निर्माण अपनी जवान होतीआँखों से देखा। सेवाग्राम में बापू के अनेक बार संबोधन सुनने का लाभ उठाने वाले आज कितने लोग हमारे बीच हैं । अग्निहोत्री जी छह किलोमीटर पैदल चलकर सेवाग्राम पहुंचे थे । उनके अनुसार महात्मा गांधी को सुनने के लिए लोग मीलों पैदल चलकर आते थे ।

आज कितने लोग ऐसे हैं जिन्होंने इन ऐतिहासिक घटनाओं को व्यस्क नज़र से देखाऔर महसूस किया था। पहले आम चुनाव संपन्न होने के बाद आईपीएस के तौर पर नियुक्ति मिली । यह सफ़र मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक पद तक निर्विघ्न चला ।  यूं तो पूरे जीवनकाल में उन्हें अनेक राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के घटनाक्रमों का साक्षी होने का अवसर मिला। लेकिन आज केवल दो -तीन का ज़िक्र।

हिन्दुस्तान में कमांडो ट्रेनिंग आज भी सख़्त मानी जाती है। अग्निहोत्री जी शुरुआती बैच के दक्ष कमांडो में से थे। छापामार शैली के युद्ध के गहरे जानकार। आज हमारे बीच इस तरह के अफसर न के बराबर बचे हैं। इसी कारण जब बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान ने मुक्तिवाहिनी का गठन किया  तो उनके अनुरोध पर मुक्तिवाहिनी को कमांडो -छापामार गुर्रिल्ला शैली में जंग की ट्रेनिंग देने वाले गिने चुने अधिकारियों में से एक अग्निहोत्री भी थे।

आगे बढ़ने से पहले बता दूँ कि देश के सबसे सख़्त पुलिस अफसर जूलियो रिबैरो उनके बैचमेट थे और पंजाब से आतंकवाद का सफाया करने वाले जांबाज़ के पी एस गिल उनके मातहत एसपी थे।  पचास बरस पहले अशांत असम में  डीआईजी के तौर पर जब अग्निहोत्री जी ने कमान संभाली तो गिल को एक तरह से ट्रेंड करने का काम उनके जिम्मे था। तेजपुर में वे श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह के समकक्ष  थे ,जो बाद में भारत के गृह सचिव और सिक्किम के राज्यपाल बने। एक दौर ऐसा भी आया जब बांग्लादेश की हालत गंभीर हो गई । तब वह पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था । शेख मुजीबुर्रहमान ने मुक्तिवाहिनी का गठन किया और उस मुक्तिवाहिनी को फौजी ट्रेनिंग देने का काम जिन लोगों ने किया ,उनमें अग्निहोत्री जी भी एक थे । जब बांग्लादेश बना तो आज़ादी के उन मतवालों ने अग्निहोत्री जी को सलामी दी ।

रमेश किशोर अग्निहोत्री भारत के एविएशन रिसर्च सेंटर और उसके गुप्तचर संगठनों के साथ लंबे समय तक काम करने वाले विरले अफसरों में से थे । रॉ के साथ भारत के सबसे चर्चित अफसर आर एन काव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले वे करीबी अधिकारी थे । सच बोलने के कारण दोनों के बीच असहमतियां भी बनीं ,लेकिन उन्होंने सच का साथ नहीं छोड़ा । नेहरूजी,इंदिराजी तथा अनेक मंत्रियों के बीच अपनी बेबाकी तथा साहस के लिए वे जाने जाते थे । अनेक पुस्तकों के लेखक अग्निहोत्री जी को मेरी श्रद्धांजलि । क़रीब 25 बरस पहले भरोसे में उन्होंने जो जानकारियां साझा कीं ,वे भारत के एक अलिखित इतिहास के दुर्लभ पन्ने हैं । वे नहीं हैं लेकिन उनको गोपनीयता का वादा देने के बाद उसे तोड़ने का साहस मैं नहीं करना चाहता । यहाँ उनका चित्र और उनकी कुछ किताबों के कवर प्रस्तुत हैं ।

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