भारी पानी यानी हैवी वाटर के भारी फायदे!

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प्रितपाल कौर, सलाहकार सम्पादक, 6डी

परमाणु रिएक्टर में हैवी वाटर यानी भारी पानी के इस्तेमाल के बारे में हम में से बहुत से लोग जानते हैं. इसके इस्तेमाल से रिएक्टर से ऊष्मा को संचालित  करने के साथ ही परमाणु ईंधन के फिशन से पैदा हुयी ऊष्मा को ठंडा करने का भी काम लिया जाता है.  लेकिन  हम में से बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि वक़्त के साथ इसी भारी पानी के कितने ही और उपयोग खोजे गए हैं और लगातार किये जा रहे हैं.  

भारी पानी के उत्पादन में भारत आत्मनिर्भर

मिसाल के तौर पर पश्चिमी देशों में लगभग एक दशक से भी अधिक समय से कैंसर जैसी बीमारियों के  इलाज में भारी पानी का उपयोग सफलता पूर्वक किया जा रहा है.  यह कीमो थेरेपी और रेडिएशन थेरेपी से होने वाले साइड इफेक्ट्स से पूरी तरह आज़ाद है. 

भारी पानी से चमड़ी की कई बीमारीओं को दूर किया जा रहा है. इसके उपयोग से हमारे डी. एन. ए. के दोषों को दूर किया जा रहा है. जैसे  कि  अनुवांशिक बीमारीओं डायबिटीज, दिल के रोग , थेलासेमिया वगरेह में भी इसका उपयोग हो रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि तीन महीने तक लगातार DDW पानी को एक निश्चित मात्रा में पीने से कैंसर के रोगी के जीवन-काल  में बढ़ोतरी के साथ साथ डी. एन. ए. के दोषों को दूर करके जीवन का रूप और स्तर सुधारने में सफलता मिल रही है. पश्चिमी देशों में यह पानी बोतलों में पीने के लिए बाज़ार में उपलब्ध है. जल्दी ही बोर्ड इसे भारतीय बाजारों में बिक्री के लिए उतारने वाला है. बोर्ड का दावा है कि इसकी कीमत अन्तराष्ट्रीय बाज़ार की कीमत से कई गुना कम होगी. 

आखिर ये  ड्यूटेरियम  है क्या ?

हाइड्रोजन का एक स्थाई आइसोटोप है, ड्यूटेरियम. आइसोटोप वह तत्व होता है जिसके नाभिक में न्यूट्रॉन की संख्या सामान्य तत्व में न्यूट्रॉन की संख्या से अधिक होती है. इसकी वजह से तत्व के रासायनिक गुण तो नहीं बदलते मगर भौतिक गुण बदल जाते है. वह मात्रा में भारी हो जाता है. और कई बार उसमें से विकिरण भी निकलने लगते हैं. इन आइसोटोप के  कई तरह के उपयोग हो सकते हैं.

भारी पानी बोर्ड 

1984 में डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने यूरेनियम को ईंधन और भारी पानी को मंदक के रूप में उपयोग करते हुए तीन चरणों वाले न्यूक्लियर ऊर्जा कार्यक्रम का मॉडल तैयार किया. भारत के लिए इस कार्यक्रम की सफलता के लिए भारी पानी का औद्योगिक उत्पादन होना और आत्म-निर्भर होना ज़रूरी था. 

में भारी पानी की पहली बूँद 9 अगस्त 1962 को नांगल में हुयी. मगर यहाँ इसका उत्पादन ज़रुरत से बहुत कम था. जिसकी वजह से परमाणु ऊर्जा विभाग ने देश में सात बड़ी क्षमता वाले केंद्र स्थापित किये. कोटा, मणगुरु , बड़ोदा, तालचेर, तूतीकोरन, थाल और हजीरा. और इस तरह आज न केवल हम आत्मनिर्भर हुए हैं बल्कि हम भारी मात्रा में भारी पानी निर्यात भी कर रहे हैं. 

साथ ही पूरी दुनिया में भारत एकलौता देश है जहाँ के वैज्ञानिकों को भारी पानी के उत्पादन की बहुविधियों में महारत हासिल है. हमारी देश में कई विधियों से भारी पानी का प्रचुर मात्र में उत्पादन किया जाता है. 

भारी पानी में आत्मनिर्भरता के बाद न्यूक्लियर कार्यक्रम में सहायता के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा विभाग समाज के हित और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रहा है. भारी पानी जो कि ड्यूटेरियम (हाइड्रोजन का आइसोटोप) का ऑक्साइड है. सामान्य पानी जैसा ही है सिर्फ इसके भौतिक गुण कुछ अलग हैं. यह रेडियो धर्मी नहीं है और इसीलिये मनुष्य के लिए हानिकारक नहीं है. इसका उपयोग परमाणु रिएक्टर में मंदक और शीतलक के तौर पर होता है. 

भारी पानी बोर्ड यूरेनियम ईंधन वाले न्यूक्लियर रिएक्टर के लिए भारी पानी की घरेलू ज़रुरत तो पूरा कर ही रहा है साथ ही स्वास्थ्य सेवा, कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए भी आइसोटोप के उत्पादन में भी लगा हुआ है. इसके अलावा बोर्ड यू. एस. ए., फ्रांस, कोरिया गणराज्य जैसे देशों को भी उच्च गणवत्ता का भारी पानी निर्यात कर के भारत के लिए विदेशी पूँजी अर्जित कर रहा है. 

ड्यूटेरियम का उपयोग लो वाटर पीक ऑप्टिकल फाइबर के निर्माण में भी होता है. जो सूचना प्रदुदोगिकी के लिया वरदान साबित हुया है. बोर्ड D 2 गैस का उत्पादन करता है जो ऑप्टिकल फाइबर निर्माताओं को सप्लाई होती है. इसके अलावा ड्यूटेरियम इलेक्ट्रॉनिक्स, लेज़र टेक्नोलॉजी ऑप्टिकल रिकॉर्डिंग, आइसोटोप हाइड्रोलॉजी, जीवन विज्ञान आदि में भी उपयोगी साबित हुया है. ड्यूटेरियम दवाइयां कम विषाक्त होने के साथ ही औषधि रूप से अधिक प्रभावशाली होती हैं. इनके अलावा बोर्ड भारी पानी की आपूर्ति से गैर न्यूक्लियर प्रयोगों के विकास के लिए अनुसंधान में भी सहायता करता है. 

पर्यावरण अभियान :

भारी पानी बोर्ड ने फ्लू गैसों से SPM को घटाने के लिए ESP की कार्यक्षमता सुधारने में टेक्नोलॉजी को विकसित कर के उसे पेटेंट भी करवा  लिया है. यानी भारी पानी एक ऐसे उताप्द के तौर पर सामने आया है जा न सिर्फ नयूक्ल्यिर रिएक्टर में मंदक और शीतलक के तौर पर इस्तेमाल होता है बल्कि इसके कितने ही उपयोग आज हो रहे हैं और नए-नए अनुसन्धान इस क्षेत्र में लगातार भारी पानी बोर्ड के द्वारा  किये जा रहे हैं.    

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