भारत विश्व का ‘सबसे खतरनाक देश’ – सर्वे

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प्रितपाल कौर, सलाहकार सम्पादक, 6डी

नई दिल्ली, थोमसन रायटर्स फाउंडेशन के एक सर्वे के अनुसार भारत विश्व का वो देश है जो महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है. पिछले हफ्ते जब से ये रिपोर्ट जारी हुयी है मीडिया में तरह-तरह से इसके विरोध और पक्ष में आवाजें उठ रही हैं. सरकारी पक्ष अभी खुल कर सामने नहीं आया है मगर कई राजनैतिक दल व व्यक्तिगत तौर पर भी प्रमुख लोग और संस्थान व आम जनता; सभी इस बारे में अपनी-अपनी राय अलग-अलग प्लेटफार्म पर रख रहे हैं. 

इसी सिलसिले में सामाजिक वैज्ञानिक इंदु अग्निहोत्री का कहना है कि इस सर्वे ने एक ज्वलंत समस्या की तरफ हमें जागरूक किया हो ऐसा तो नहीं है, क्यूंकि आज हम जिस दौर से गुज़र रहे हैं इस बात से हम अनजान हों ऐसा नहीं है. हम सब जानते हैं भारत में आये दिन लड़कियों और महिलाओं के अपहरण और बलात्कार की घटनाएँ होना आम बात हो गयी है. 

निर्भया कांड कोई देश में पहला ऐसा काण्ड हुआ हो ऐसा भी नहीं था. उससे पहले सत्तर के दशक  में गीता और संजय चोपड़ा के साथ जिस तरह रंगा और बिल्ला ने अपहरण व बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी थी, वह किस्सा सामाजिक मानस पटल पर आज भी जिंदा है. लेकिन निर्भया काण्ड के बाद जिस तरह के आन्दोलन देश भर में, ख़ास कर राजधानी दिल्ली में हुए थे, जिस तरह दिल्ली सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया था और सरकार ने, मुख्यमंत्री ने जिस तरह खुद निर्भया के इलाज में व्यक्तिगत तौर पर शामिल हो कर इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया था तो एक सामाजिक चेतना में उम्मीद जगी थी कि ऐसी घटनाएं अब भविष्य में नहीं होंगीं. मगर अफ़सोस की बात है कि उसके बाद भी ऐसे घटनाएँ लगातार हो रही हैं और उनकी जघन्यता दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है. ये अपराध अब वृद्ध महिलाओं और नवजात बच्चिओं के साथ भी होने लगे हैं.  

इस सर्वे को लेकर एक सवाल जो सबसे पहले सामने आता है वो ये कि क्या पश्चिम का मीडिया हमारे सामाजिक सन्दर्भों को लेकर कुछ अधिक ही नकारात्मक दृष्टि से तो नहीं रिपोर्ट करता? क्या आज भी उनके लिए भारत एक साँपों और सपेरों वाला पिछड़ा हुया देश है?

इस पर कई तरह के सवाल उठ खड़े होते हैं. इस सर्वे को लेकर एक सवाल जो सबसे पहले सामने आता है वो ये कि क्या पश्चिम का मीडिया हमारे सामाजिक सन्दर्भों को लेकर कुछ अधिक ही नकारात्मक दृष्टि से तो नहीं रिपोर्ट करता? क्या आज भी उनके लिए भारत एक साँपों और सपेरों वाला पिछड़ा हुया देश है? 

एक बात और कि क्या पश्चिम में महिलाएं पूरी तरह से निरापद हैं? क्या वहां स्त्रियों के प्रति यौन  अपराध नहीं होते?

तो सत्य तो यही है कि न तो पश्चिम हमें पूरी तरह से पिछड़ा हुआ मानता है और ना ही ऐसा है कि पश्चिम में स्त्रियों के प्रति यौन-अपराध नहीं होते ये बात सच है. वहां भी बलात्कार होते हैं. मगर शायद उनकी जघन्यता भारत के मुकाबले कम है. और शायद वहां बच्चिओं के साथ ऐसी घटनाएँ आम नही हैं. इसके कई कारण हैं. हम उन पर न जाते हुए मुख्य मुद्दे पर ही आगे बात करें तो क्या ऐसा होने भर से हम पाक दामन हो जाते हैं? तो इसका सीधा सा जवाब है: नहीं. 

हमारे यहा दिन पर दिन यौन-अपराध जिस तरह बढ़ रहे हैं वह चौंका देने वाला सत्य है. ऐसा नहीं कि कुछ साल पहले तक ये अपराध बिलकुल नहीं होते थे. होते थे, मगर आम तौर पर लोग शर्म के मारे छिपा ले जाते थे. पुलिस में या मीडिया में रिपोर्ट नहीं होती थी.  मगर अब स्त्रियाँ मुखर हो गई हैं. वे अपने साथ हुए यौन-अपराध और हर तरह के अन्याय के खिलाफ आवाज उठाती हैं. सामाजिक कलंक का दंश अब बलात्कार पीड़ित को नहीं डराता. साथ ही मीडिया भी अब पहले से अधिक जागरूक और विस्तृत हो गया है. ये कई वजहें है कि अब यौन-अपराध होने पर पीड़ित सामने आ कर खुद के साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाती है और परिवार भी इसमें सहयोग देता है.  नन्ही बच्चिओं के साथ बलात्कार होने पर तो पूरा समाज ही दहल उठता है.  

इसके अलावा दिल्ली एक ऐसा शहर या कहे कि राज्य है जहाँ देश भर से आये लोग शरण पाते हैं. यह एक महानगर तो है ही, साथ ही यहाँ दूर गाँव से आया हुआ एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी शरण पाता है, जो अपने साथ गाँव की पृष्ठभूमि और विचारों को ले कर आता है. यहाँ आकर उसे एक सांस्कृतिक झटका लगता है, यहाँ का खुलापन और रंगीनी देख कर. फिर सिनेमा और मुफ्त के डाटा पर आसानी से उपलब्ध पोर्न देख कर उसकी मति- भ्रष्ट होने की आशंका खासा बढ़ जाती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम उसके द्वारा किये गए यौन अपराध को सही ठहरा दें.  देखना ये है कि हम इस पूरे सिस्टम को किस तरह दुरुस्त करें कि इन घटनाओं पर रोक लगाई जा सके. 

 भारत एक बहु सांस्कृतिक देश है. यहाँ अति उच्च वर्ग से लेकर मध्य वर्ग के कई स्तरों से हो कर अति निम्न वर्ग के लोग एक ही शहर में गुज़र-बसर करते हैं. तो आपस में सामजिक टकराव होना  अवश्यम्भावी हैं.  इन पर रोक लगाने के लिए कुछ हद तक सामजिक सुधार के साथ-साथ शिक्षा का विस्तार और आचरण की शिक्षा का तेज़ी से विस्तार होना बहुत ज़रूरी है. 

आज हालत ये हो गयी है कि किसी भी छोटे या बड़े शहर के किसी छोटे से दुकानदार के पास ऐसे वीडियो क्लिप्स या फोटो मिल जाते हैं जिनमें गैंग रेप करने की रिकॉर्डिंग या युवतिओं की नग्न तस्वीरें होती हैं. ज़ाहिर है ये सब उन्हें डरा धमका कर रिकॉर्ड कर लिया जाता है. बाज़ार में  ऐसी तस्वीरों की कीमत ५० से सौ रूपये के बीच होती है.  ज़ाहिर है लोग इन्हें खरीदते हैं और एक वीभत्स किस्म का मनोरंजन धीरे-धीरे हमारे समाज में ज़हर की तरह फैल रहा है.  यहाँ तक कि अब तो देश के ऐसे इलाकों से भी यौन अपराधों की ख़बरें आने लगी हैं जहाँ ऐसी घटनाओं के बारे में कभी सोचा तक नहीं था, जैसे कि लेह और लद्दाख.  

हमारा राजनितिक परिदृश्य भी उत्साह-जनक नहीं है. अक्सर उच्च पदों पर बैठे लोग नासमझी में ऐसी बयानबाजी कर देते हैं जो असामाजिक तत्वों को ऐसे काम करने का बढ़ावा देते लगते प्रतीत होते हैं.  इस तरह की बयानबाजी पर लगाम कसना भी बेहद ज़रूरी है. इसके आलावा कोई भी राजनैतिक दल इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की मंशा दिखाई देता नज़र नहीं आता. ऐसी घटनाओं पर सामाजिक शोर शराबे के बीच राजनीतिक चुप्पी बेहद अखरती है. शायद इसका कारण ये भी है कि आम तौर पर हर राजनितिक पार्टी में कुछ ऐसे लोग पाए जाते हैं जिन पर बलात्कार के आरोप में मुकदमे चल रहे हैं.  

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