Khel Khallas : 16 Most Dreaded Criminals, 16 Encounters & 16 Stories!

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Mumbai, 16 most dreaded criminals, 16 encounters and 16 stories of Mumbai Underworld. Famous investigative and crime journalist Vivek Agrawal’s new book “Khel Khallas” has arrived in the market. Vivek talks about the reality of criminal’s lives and why they went into the swamp of crime … And their end. Very engrossing and entertaining stories. A must read. Vivek is author of MumBhai and MumBhai Returns.

Editor’s rating: ****1/2 out of 5.

खेल खल्लास: 16 मुठभेड़ों का सोलह आने सच

 जो कर गया, वो घर गयाजो डर गया, वो मर गया

मुंबई के गिरोहबाजों और उनके सरगनाओं, सेनापतियों, सिपहसालारों, किलेदारों, फौजदारों, जत्थेदारों, सूबेदारों, सुपारी हत्यारों, प्यादों तक पूरी फौज कैसी खामोशी से अपना काम करके निकल जाती है, यह देख उन दिनों बड़ा अचरज होता था, जिन्हें 80 या 90 का दशक कह सकते हैं। आज यह सोचना भी बेकार ही लगता है। कारण है दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अबू सालेम, अरुण गवली, बाबू रेशिम, माया डोलस, हाजी मस्तान, वरदराजन मुदलियार, करीम लाला, यूसुफ लाला, सुखुरनारायण बखिया, अमीरजादा पठान, आलमजेब पठान, फीलू खान जैसे नामों के बीच कुछ की मौत इस कदर बेहिस थी कि कोई भी याद करेगा तो उसे अच्छा नहीं लगेगा।

अपराध जगत में यह कहावत आम है – जो आग से खेलेंगा, वो आग में मरेंगा।

सच है यह।

पूरा-पूरा सच। जितने गिरोहबाजों और उनके सहयोगियों को मैं जानता हूं, जो पिस्तौलों और चाकुओं से लोगों की जान लेते रहे हैं, अंततः वे मारे भी उन्हीं हथियारों से ही थे। जान लेने-देने के खेल में खिलाड़ियों के बीच बस वक्त का ही फर्क होता है। कब-किसकी मौत आएगी, बस उतना ही अंतर होता है।

मौत कैसी भी हो, वह दुख देकर ही जाती है। जो मर जाते हैं, वे तो बस मुक्त हो जाते हैं। जो पीछे बचे रहते हैं, वे सोग मनाते हैं। गिरोहबाजों की मुठभेड़ों में मौत पर परिवार और रिश्तेदार – दोस्त – यार – गिरोह के संगी-साथी दुख से भरे होते हैं, दूसरी तरफ पुलिस और उनके शिकारों के परिजन जश्न मनाते हैं। मुठभेड़ से कुछ को मिलता है मान-सम्मान, पदक, तरक्की लेकिन दूसरी तरफ माता-पिता इससे हैरान हैं कि बेटे को कितना समझाया, पर ना माना, आज देख लो कैसी मौत मरा। कैसी हिकारत दे गया हमें भी समाज में।

मुठभेड़ों में जो मारे गए, वे बस खत्म हो गए।

प्रकाशन समूह स्टोरी मिरर से आ रही पुस्तक खेल खल्लास में यह समीक्षा या विश्लेषण नहीं है कि मुठभेड़ सच्ची थीं या गलत। बस इतनी सी बात सामने रखी है कि ये कौन थे… और क्यों थे… उनकी जिंदगी की असलियत क्या थी… वे क्यों अपराध के दलदल में जा धंसे… अंततः उनका अंत एक ही था – पिस्तौलों से निकला पिघला सीसा जो जिस्म में पैबस्त हुआ तो जान बाहर निकाल कर ही माना। इस किताब में 16 कहानियां हैं, जो हर गिरोहबाज का हर सच पूरा-पूरा उधेड़ कर सामने रख देता है।

खेल खल्लास का उद्देश्य समाज के उन ‘स्खलित नायकों’ की सच्ची दास्तान पेश करना है, जो पुलिस मुठभेड़ों में भले ही हताहत हुए, उनके जोश व हिम्मत के आगे दुश्मन सदा पस्त रहते थे। वे गोलियों की भाषा जानते थे, वही बोलते थे। यही कारण है कि वही भाषा उनकी समझ में भी आती थी। वही सुनना भी पसंद करते थे। वे इसी के साथ जीते हैं, इसी के साथ मरते हैं।

मुंबई माफिया में किसी की मौत पर सहज ही कहा जाता है – इसका तो हो गया खेल खल्लास। बस ये ही दो शब्द इस किताब के लिए भी मुफीद लगे – खेल खल्लास

मुंबई माफिया का खेल बड़ा निराला है। इस खेल के जो सबसे हुनरमंद और धाकड़ खिलाड़ी हैं, उनकी दो टीम हैं। एक पुलिस की, दूसरी गुंडों की। यहां रेफरी होते हैं न्यायाधीश। वे तय करते हैं कि सही क्या है, गलत क्या। गुंडों और पुलिस के बीच जारी मैच में एक पत्रकार किसी स्कोरर की तरह उनके बीच काम करते हैं। खेल से तटस्थ रहते हुए, हर दांव-पेंच व रिकॉर्ड दर्ज करना ही उनका असली धर्म होता है। वो तय नहीं कर सकते कि किसने खेल सही खेला, कौन गलत था। जो थोड़ा सा बहके या गलत दिशा में जा रहे, उनका भी नाम किसी गोली या चाकू पर लिखा जाता है।

मुंबई माफिया में यह हर वक्त चलता रहा है, आगे भी चलता रहेगा – कभी खेल बनेगा तो कभी बिगड़ेगा भी। कभी कोई बचेगा – तो कभी किसी का हो जाएगा – खेल खल्लास

मुंबई माफिया और पुलिस के बीच मुठभेड़ें दर्जनों नहीं, सैंकड़ों की संख्या में हुई हैं। कई गिरोहबाज पिछले चार दशकों में मारे जा चुके हैं। उनकी सच्ची दास्तान लिखने का साहस बहुत ही कम लोगों ने किया है। इनमें से एक विवेक अग्रवाल हैं, जिन्होंने गिरोहबाजों के बीच जाकर उनकी जिंदगी के वे पल चुराए, जो कलम के जरिए कागजों पर उतरे, तो एक के बाद एक किताबों की शक्ल में सामने आने लगे।

उनकी किताबों मुंभाई और मुंभाई रिटर्न्स ने खूब हंगामा मचाया। इन किताबों पर कराची निवास में तरणताल के सामने खड़े गिरोह सरगना दाऊद इब्राहिम के ताजातरीन और नायाब फोटो के अलावा अली बुदेश की इकलौती तस्वीर छाप कर विश्व भर की सभी एजंसियों और पत्रकारों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी।

मुंबई के गुंडों की मुठभेड़ों में मौत के जरिए कही कहानियों का ये संग्रह है – खेल खल्लास। इसमें गिरोह सरगनाओं और उनके साथियों के जन्म से मृत्यु तक की कहानियां हैं। इनकी कुछ और कहानियां लिखी जा रही हैं, जल्द ही वे भी सामने आएंगीं। विवेक अग्रवाल की वेबसाईट www.vivekink.com पर आगामी पुस्तकों की सूचना मिल सकती है, यदि संपर्क करना चाहें तो vivekink@yahoo.com पर ईमेल करें। पुस्तकों के लिए anootha.com या shop.storymirror.com पर आदेश दे सकते हैं।

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