आइये अल्ज़यिमेर्स की बात करें !

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प्रितपाल कौर, सलाहकार सम्पादक, 6डी

नई दिल्ली, 21 सितम्बर को विश्व भर में अल्ज़यिमेर्स दिवस मनाया जाता है. आइये हम भी इसकी बात करें. ये कोई ऐसी बीमारी नहीं जिसे दबा कर या छिपा कर रखा जाए. अकेले भारत में ही तकरीबन चालीस लाख लोग  डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी से पीड़ित हैं. और 2030 तक इनकी तादाद दोगुनी हो जाने की आशंका जताई जाती है. इसी के तहत गीता सहाय के निर्देशन में बनी फिल्म ‘आय रेमेम्बेर’ जिसकी पटकथा भी खुद गीता ने ही लिखी है, उल्लेखनीय है.

पूरी दुनिया में इस बीमारी के लगभग पांच करोड़ मरीज़ हैं और इनमें हर साल एक करोड़ लोग और जुड़ जाते हैं. अल्जायिमेर्स इस भूलने वाली बीमारी का सब से कॉमन फॉर्म है, कुल 60 से 70 % डिमेंशिया के  मरीज़ अल्ज़यिमेर्स  की बीमारी से ही पीड़ित होते हैं.  (WHO रिपोर्ट- दिसंबर 2017). दुःख की बात ये है कि इनमें भी हर तीन में से दो मरीज़ महिलाएं ही होती हैं. 

Alzheimer’s Disease International (ADI) के अनुसार हर तीन सेकंड पर दुनिया में कहीं न कहीं कोई एक इंसान डिमेंशिया का शिकार हो जाता है. ADI 94 अल्ज़िमेर्स संगठनों का umbrella संगठन है . World Alzheimer’s माह के तहत ADI इस बीमारी के प्रति आम लोगों को जागरूक बनाती हैं. साथ ही  इसके बारे में फैली भ्रांतियों और कलंक की भावना को दूर करने में लगी हैं. World Alzheimer’s माह (सितम्बर) को 2012 में शुरू किया गया था. विश्व अल्ज़यिमेर्स दिवस 21 सितम्बर के दिन होता है. 

फिल्म ‘आय रेमेम्बेर’ का ट्रेलर लॉंच 

फिल्म ‘आय रेमेम्बेर’ की मुख्य भूमिकाओं में हैं गायत्री शर्मा, सर्बसिस भट्टाचार्य और श्रृंखला सहाय. फिल्म की कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित है. कहानी एक महिला और उसके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे अल्ज़यिमेर्स  की शुरुआत हो चुकी है. कहानी की नायिका एक सफल पत्रकार है, और अपने ही तरीके से इस बीमारी से दो-चार होती है. इस बीमारी के चलते वह अपनी याददाश्त खोती है और इसके साथ ही खुद अपने ही जीवन से उसका नियंत्रण भी छूटने लगता है.  वह अपनी पहचान को धीरे धीरे खोते हुए किस तरह अपने जीवन में उठा-पटक और परेशानी का सामना करती है उसी की चित्रण इस फिल्म में खूबसूरती से किया गया है.  नायिका के पति और बेटी के लिए उसकी देख-भाल करना और खुद अपने जीवन को सुचारू रूप से चलाना बेहद मुश्किल साबित हो रहे हैं. वे प्रेम, खुशी, ज़िम्मेदारी और अपनी निजी ख्वाहिशों के बीच संतुलन बना पाने में कई तरह की चुनौतियों का सामना कर  रहे हैं. फिल्म प्रेम और प्रेम से उपजे विभिन्न पहलुओं पर रोशनी तो डालती ही है साथ ही कई सवालों के जवाब भी देती है, जो इस तरह की मुश्किल परिस्थितियों में किसी भी परिवार के सामने आ खड़े हो सकते हैं. 

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