सियासत की बंदरबाँट में खो गया गठबंधन धर्म

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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार

बहुदलीय लोकतंत्र में अनेक राजनीतिक दलों का होना देश की प्रजातांत्रिक सेहत का सुबूत है । सत्ताधारी दल निरंकुश न हो सकें इसलिए छोटी पार्टियों की भूमिका प्रेशर कुकर के सेफ़्टीवॉल्व का काम करती हैं ।

सिद्धांत के तौर पर यह एक आदर्श स्थिति मानी जानी चाहिए ।आदर्श इसलिए कि बहुमत प्राप्त किसी बड़े राजनीतिक दल को यह भ्रम न हो जाए कि देश को अपने ढंग से चलाने का कोई वैध लायसेंस उसे मिल गया है । हिंदुस्तान जैसे विराट मुल्क़ ने अपने अतीत और सामाजिक विरासतों के ज़रिए संवैधानिक दायरे में शासन शैली के कुछ मापदंड रच लिए हैं । कोई भी राजनीतिक दल इन मापदंडों से बचकर या उनकी उपेक्षा कर सरकार चलाने का उम्दा नमूना पेश नहीं कर सकता ।

उपेक्षा का यह दुस्साहस तो भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी नहीं कर पाए थे । जब 1947 में उन्होंने अपना पहला मंत्रिमंडल गठित किया तो उसमें उनके और कांग्रेस के घनघोर विरोधी भी शामिल हुए थे हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी , शेड्यूल कास्ट फ़ेडरेशन के डॉक्टर भीमराव आंबेडकर और पंथिक पार्टी के लाल बलदेव सिंह समेत कुछ अन्य राजनेताओं के नाम इस कड़ी में लिए जा सकते हैं । जवाहर लाल नेहरू असहमत होते हुए भी अनेक अवसरों पर उनके सुझाव मानते थे । बाद में सरकार के फ़ैसलों में वे सुझाव अमल में आते दिखाई देते रहे। यहाँ यह याद दिलाना आवश्यक है कि कांग्रेस को बयासी फ़ीसदी बहुमत प्राप्त हुआ था।

बुनियादी तौर पर इसे स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होना चाहिए कि विविधताओं से भरे भारत में कोई एक या दो बड़ी पार्टियाँ कश्मीर से कन्याकुमारी तक मतदाताओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं । अलग अलग भाषाएँ, बोलियाँ, समुदायों के रीति रिवाज़ और मज़हब अलग राजनीतिक दल के गठन की वजह बनते हैं ।अपर्याप्त प्रतिनिधित्व करने वाली बड़ी पार्टी से आम आदमी की आवाज़ उठाने वाली छोटी पार्टी कहीं बेहतर है ।एक प्राचीनतम गणतंत्र की यह शानदार परंपरा है । इसके पीछे समाज और देश की समस्याओं – प्राथमिकताओं पर मिल जुल कर काम करने की मंशा ही कही जा सकती है । आज़ादी के बाद कांग्रेस ने अधिकांश समय बहुमत वाली सरकार चलाई। इस कारण छोटे दलों और उनके नुमाइंदों का काम एक तरह से प्रतिपक्ष की भूमिका जैसा ही रहा। वे अपने अपने इलाक़ों की आवाज़ उठाते। कभी उनकी बात मान ली जाती तो कभी बहुमत के बोझ तले दब जाती।नब्बे के दशक तक यह सिलसिला चलता रहा।

जब नरसिंह राव की सरकार पराजित हुई तो हिन्दुस्तान में एक अस्थिर राजनीति का दौर प्रारंभ हो गया।इसी के साथ ही गठबंधन सरकारों का सिलसिला शुरू हो गया। एकाध अपवाद पहले भी था ,लेकिन गठबंधन में आने के बाद छोटी पार्टियों ने सत्ता का स्वाद पहली बार चखा।बेशक़ उन दिनों गठबंधन में शामिल छोटे राजनीतिक दल अपने विचारों की कुछ पूँजी के सहारे इसमें शामिल हुए थे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में सबसे बड़े – राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में अनेक मँझोली और छोटी पार्टियाँ सरकार का हिस्सा बनीं। हालाँकि बहुजन समाज पार्टी का बीजेपी के साथ गठबंधन टूटने का एक कड़वा प्रयोग यह देश देख चुका था।उस गठबंधन में अटल बिहारी वाजपेयी के ऊँचे राजनीतिक क़द की वजह से छोटी पार्टियाँ एक सीमित दायरे में ही अपनी आवाज़ में आक्रोश का अंदाज़ दिखा पाती थीं। इसके बाद धीरे धीरे गठबंधन के धर्म का आधार खिसकता गया और दबाव की राजनीति आरंभ हो गई। गठबंधन में शामिल छोटी पार्टियों ने बड़ी पार्टी को आँखें दिखाने और ग़ुर्राने की अदा पेश करने लगीं। 

इन दिनों सिर्फ़ गठबंधन से काम नहीं चलता।अब महा गठबंधन नाम का नया अवतार सामने आ गया है। एनडीए के उत्तर में यूपीए उतर आया है।ज़ाहिर है गठबंधन से महा गठबंधन बड़ा है तो दोनों बड़े महा गठबंधन अपने अपने शो केस में अधिक से अधिक पार्टियों को करीने से सजा लेना चाहते हैं।दोनों यह साबित करने पर तुले हुए हैं कि तेरे गठबंधन की कमीज़ से मेरी कमीज़ उजली है। इस चक्कर में सिद्धांतों और सरोकारों की सियासत कहीं खो गई है और छोटी पार्टियाँ एक तरह से ब्लैकमेल पर उतारू नज़र आती हैं।तक़लीफ़ देह है कि बड़े दलों के सामने हथियार डालने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है।दोनों ओर एक जैसी बुराइयाँ विकराल हैं। कोई एक गठबंधन को अमीरों का बताता है तो दूसरे को सांप्रदायिक गठबंधन कहा जा रहा है।

समुदायों और वर्गों को बाँटने की कोशिशें होने लगी हैं। जिसे जहाँ मनमाफ़िक सौदा नहीं मिलता तो झटपट दूसरे गठबंधन पर जाल फेंकना शुरू हो जाता है।हमारी लोकतान्त्रिक सेहत पर इसका उल्टा असर हो रहा है। चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर – नुकसान तो खरबूजे का ही होगा। यह बात राजनीतिक नियंताओं को समझ लेना चाहिए।


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