हथियारों का कुटीर उद्योग 6 – सिकलीगर न घर के, न घाट के

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वे न तो घर के हैं, न घाट के।

यह दर्द है उन सिकलीगरों का जिन्हें न तो सिख समाज अपना मानता है, न सरकार ने उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया, न ही उन्हें मिलती है सरकारी या निजी कंपनियों में नौकरियां।

उनके लिए तो जिंदगी का अर्थ ही अंधेरा है।

हमने इस इलाके के अंदर तक जाकर पूरी पड़ताल की।

देश के सबसे गंभीर खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल की एक और खोजी रपट।

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