पुलवामा संहार :परदे के पीछे की कहानी

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राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार

श्मीर में अब तक के सबसे खुंखार आतंकवादी हमले के तार पाकिस्तान से जुड़ते हैं। यह कोई नई बात नहीं रही। यह तथ्य भी भारतीय समझने लगे हैं कि हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियाँ अन्तर्यामी हैं।  वे हर हमले से पहले संबंधित राज्य और सुरक्षा तंत्र को आग़ाह कर देती हैं।

हमले के बाद वे कुछ इस तरह मीडिया को यह जानकारी देती हैं जैसे कोई श्रेय ले रही हों। ग़लती तो संबंधित राज्य अथवा पीड़ित पक्ष की होती है ,जो वह बचाव नहीं कर पाता। अर्थात निष्कर्ष यही है कि हमले होते रहेंगे। गुप्तचर उससे पहले चेतावनी देते रहेंगे। हम असहाय देखते रहेंगे।

सवाल यह है कि भारत इन वारदातों को समय रहते क्यों नहीं रोक पाता ? सेना और अर्ध सैनिक बल सिर्फ़ अपनी ताक़त दिखा सकते हैं। उसके अलावा उनकी क्या भूमिका हो सकती है ? वे हर मर्ज़ की दवा नहीं हो सकते। ताक़त के बल पर आप जंग जीत सकते हैं लेकिन जहां मुक़ाबला कूटनीति और कुचक्र भरी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से हो,वहाँ हथियार और सैनिक बल काम नहीं आते। वहाँ सरकार को अपनी बिसात बिछानी होती है और इसमें नाकामी घोर शर्म तथा चिंता की बात है। कूटनीति,विदेश नीतिऔर राजनीतिक मोर्चे पर विफ़लता से बचाव सेना और सुरक्षाबल नहीं कर सकते।

पुलवामा संहार के बाद  पाकिस्तान पर कार्रवाई के सिवा कोई विकल्प नहीं । 

एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा। ध्यान दीजिए दो महीने पहले पाकिस्तान दिवालिया हो रहा था। जर्जर अर्थ व्यवस्था ने उसकी हालत भिखारियों जैसी कर दी थी।प्रधानमंत्री  इमरान ख़ान के लिए करो या मरो की स्थिति थी। इसलिए पद संभालते ही इमरान सऊदी अरब की शरण में गए। सऊदी अरब ने 12 अरब डॉलर की सहायता मंज़ूर कर दी। तीन अरब डॉलर पाकिस्तान के खाते में आ गए। पाँच राज्यों वाले मुल्क़ के लिए तो यह मालामाल करने वाली रकम है। इमरान ख़ान की पार्टी ने  ख़ैबर पख्तूनख्वा सूबे में पाकिस्तानी तालिबान के मुखिया हक़्क़ानी को मदरसों के नाम पर 30 लाख डॉलर की मदद दी थी।यह पैसा अमेरिकी था। हक़्क़ानी नेटवर्क भारत विरोधी है और कश्मीर में हिंसक गतिविधियों को मदद करता है।  भारत ने जब सर्जिकल स्ट्राइक की थी तो इमरान खान का खुला बयान आया था कि वे बदला लेंगे और भारत को बताएंगे कि इसका उत्तर कब और किस तरह देना है।

कश्मीर के मामले में पाकिस्तान को खुला समर्थन

सऊदी अरब भारत से अच्छे रिश्ते रखते हुए हमेशा कश्मीर के मामले में पाकिस्तान को खुला समर्थन देता रहा है। अच्छे संबंधों का आधार कारोबारी रहा है। भारत जिन देशों से क्रूड ऑइल आयात करता है ,उन देशों की सूची में सऊदी अरब हरदम पहले नंबर पर रहा है। सर्वाधिक कारोबार के कारण ही सऊदीअरब ने भारतीय प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह का सारे प्रोटोकॉल तोड़कर स्वागत किया था और उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी थी। इसके बाद  नरेंद्र मोदी को 2016 में अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया था। लेकिन पिछले साल भारत ने सऊदी अरब से पहला स्थान छीन कर उस पर इराक़ को बिठा दिया।इराक़ से 21 मिलियन टन तेल आयात बढ़ाया गया और सऊदी अरब  से 2 मिलियन टन कम किया गया। ज़ाहिर है यह स्थिति सऊदी अरब को पसंद नहीं आनी थी। उसका एकाधिकार टूट गया था। इमरान ख़ान ने इस मानसिकता का फ़ायदा उठाया और आर्थिक मदद ले ली।जानकार मानते हैं कि यही पैसा आतंकवादियों को मिल रहा है। पुलवामा संहार इसका परिणाम हो सकता है।

कूटनीतिक ख्याल नहीं रख सके

एक समीकरण और उभरता है। सऊदी अरब और ईरान के बीच रिश्तों में भारत -पाकिस्तान की तरह स्थायी तनाव रहता है। इसका भी भारत ने ख्याल नहीं रखा।एक तरफ हमने सऊदी को तेल आयात के मामले में पहले स्थान से उतारा तो उसके प्रतिद्वंदी ईरान पर निर्भरता बढ़ा दी। पाँच बरस में 11मिलियन टन से बढ़ाकर 22.59 मिलियन टन कर दिया गया। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध और सऊदीअरब के अमेरिका से मधुर रिश्तों का हम कूटनीतिक ख्याल नहीं रख सके। यह सच है कि पाकिस्तान में चीनी मदद से बने ग्वादर बंदरगाह के जवाब में ईरान का चाबहार एयरपोर्ट भारत के लिए शक्ति संतुलन का काम करता है और भारत की प्राथमिकता सूची में ईरान को महत्त्व दिया जाना ज़रूरी था। ऐसे में भारत सऊदी अरब को तेल आयात में अव्वल दर्ज़े पर रख कर इराक़,वेनेजुएला,नाइजीरिया और संयुक्तअरब अमीरात से कटौती कर सकता था।इन देशों से भीभारत तेलआयात करता है।फिलहाल इन छोटे मुल्क़ों से भारत को कोई खतरा नहीं है।पाकिस्तान ने इस मामले में कूटनीतिक कामयाबी हासिल की है।

हालत सांप – छछूंदर जैसी

इसके अलावा पाकिस्तान ने अमेरिका से भी संबंध सुधारे हैं। ईरान पर प्रतिबन्ध लगाने के बाद अमेरिका के इशारे पर भारत ने तेल आयात बंद नहीं किया। भारत का हित भी इसी में था। लेकिन इससे अमेरिका खफा है। भले ही उसने भारत को छूट दी हो ,लेकिन हमें यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए था कि पाकिस्तान अमेरिका के क़रीब न आ सके। हाल ही में पाकिस्तान ने अफ़गानी तालिबान और अमेरिका को शान्ति समझौते की मेज़ पर लाने का काम किया है। इसमें उसने भारत को अलग थलग कर दिया था। अमेरिका इससे खुश है क्योंकि अफगानिस्तान में उसकी हालत सांप – छछूंदर जैसी हो गई है। उसे इज़्ज़त से अपने सैनिकों की वापसी का बहाना चाहिए। यह बहाना पाकिस्तान ने उसे दे दिया है।अमेरिका भले ही पुलवामा के हमले की निंदा करे लेकिन अब वह पाकिस्तान के प्रति नरम रवैया अपना रहा है।

चुनाव और सिर्फ़ अपने राजनीतिक हितों में उलझे रहने के कारण भारतीय विदेश और रक्षा क्षेत्रों के अधिकारी ,राजनेता  पाकिस्तान के कूटनीतिक क़दमों पर नज़र नहीं रख सके। वे सिर्फ गाल बजाते रहे और पाकिस्तान को गीदड़ भभकी देते रहे।  उन्हें समझना चाहिए कि गरजने वाले बादल कम ही बरसते हैं।  अब गरजने का अवसर चला गया।

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