मैग्सेसे पुरस्कार विजेताओं को राज्य सरकार ने किया सम्मानित

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मुंबई-  रेमन मैग्गसेसे पुरस्कार-2018 के विजेता शिक्षा विशेषज्ञ सोनम वांगचुक और मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. भरत वाटवानी को महाराष्ट्र सरकार ने सम्मानित किया । शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े ने कहा कि शिक्षा क्षेत्र में समयानुसार बदलाव हो रहा है। परंतु आगामी काल में शिक्षा क्षेत्र को आगे ले जाते समय सोनम वांगचुक और डॉ. भरत वाटवानी जैसे लोगों की महाराष्ट्र को जरूरत है।

रेमन मैग्गसेसे पुरस्कार-2018 के विजेता शिक्षा विशेषज्ञ सोनम वांगचुक और मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. भरत वाटवानी का सम्मान

“समाज के सभी वर्गो का भावनात्मक ज्ञान बढ़ाने के लिए दोनों को ब्रांड एंबेसडर के तौर पर काम करना होगा, जिससे उनके कार्य से लोगों को प्रेरणा मिलेगी,” ऐसा विश्वास शिक्षा मंत्री विनोद तावडे ने व्यक्त किया। रेमन मैग्गसेसे पुरस्कार-2018 के विजेता शिक्षा विशेषज्ञ सोनम वांगचुक और मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. भरत वाटवानी का सम्मान समारोह सहयाद्रि अतिथीगृह में आयोजित किया गया था।

तावडे ने कहा कि दोनों रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेताओं ने खुद से समाज के लिए कुछ करने का प्रयाश किया। पाया गया है कि अपनी मिट्टी से जुड़ी शिक्षा हो तो, विद्यार्थी ज्यादा रूचि उस शिक्षा में लेते हैं। सोनम वांगचुक ने लद्धाख जैसे दुर्गम क्षेत्र में किया है। इसीतरह डॉ. भरत वाटवानी ने समाज के लिए कुछ करने की भावना से मानसिक मरीजों को सहारा दिया। आज भारत युवाओं के देश के रूप में पहचाना जाता है। भारतीयों का भावनिक ज्ञान, अच्छा मानव संसाधन निर्माण करने में किया जा सकता है और यह मानव संसाधन भारत को विभिन्न क्षेत्रों में आनेवाले दिनों में शीर्ष पर ले जाएगा। आज के भागमभाग और प्रतियोगिता के युग में विद्यार्थियों का संवाद कौशल बढ़ाने की जरूरत है। परंतु यह करते हुए विद्यार्थियों का ज्ञान बढ़ाने के साथ ही भावनिक ज्ञान बढ़ाना भी जरूरी है। आज की शिक्षा प्रणाली में भावनिक ज्ञान आवश्यक बन गया है।

सोनम वांगचुक ने कहा कि शिक्षा में सुधार समय की मांग है। बच्चों को दी जानेवाली शिक्षा भौगोलिक स्थितियों पर निर्भऱ होती है। उनका मत है बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए। बीते 30 वर्ष से अधिक काल शिक्षा क्षेत्र में काम करते हुए बदलती शिक्षा प्रणाली की तरह हमने भी बदलाव किया। डॉ. वाटवानी ने कहा कि शुरूआती दिनों में काम करते हुए परेशानी हुई। परंतु समाज में रहनेवाले एक व्यक्ति को भी हम ठीक कर दें, इस विश्वास के साथ काम शुरू किया । आज तरह-तरह की बीमारियां लोगों को हो रही है। परंतु लोग यह जल्दी मानने को तैयार नहीं होते कि वे मानसिक रोग की चपेट में हैं। इसलिए स्कूली पाठ्यक्रम में मानसिक रोग का भी पाठ शामिल किया जाना चाहिए। बीमारियों के बारे में भी विद्यार्थियों को पूरी जानकारी देनी जरूरी है।

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