जहां हुई थी ताजपोशी, वहीं दिया था अटलजी ने राजनीति से सन्यास लेने का संकेत

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मुंबई- देश के पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी का गुरुवार शाम को निधन हो गया। उन्होंने शाम 5 बजकर 5 मिनट पर दिल्ली के एम्स अस्पताल में आखिरी सांस ली। महान नेता के निधन पर पूरा देश शोक में डूबा हुआ है।

मराठी भाषा में बोलकर सियासत से सन्यास लेने का संकेत दिया था अटलजी ने 

– विनय यादव की विशेष रिपोर्ट –

अटलजी ने कई मामलों में भारतीय राजनीति में मि‍साल कायम की। पक्ष हो या विपक्ष सभी के दिल में अटल जी के प्रति आदर और सम्मान रहा है। उनके राजनीति‍ से सन्‍यास लेने की कहानी भी रोचक है । भाजपा गठन के बाद जहां अटलजी की अध्यक्ष पर ताजपोशी की गई थी, वही उन्होंने मराठी भाषा में बोलकर सियासत से सन्यास लेने का संकेत दिया था। अटलजी देश की आर्थि‍क राजधानी मुंबई पहुंचे थे। वहां एक कार्यक्रम के दौरान पहली बार उन्‍होंने राजनीति‍ से सन्यास लेने का संकेत दि‍या, वह भी मराठी में बोलकर। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के माटुंगा में स्थित षण्मुखानंद हॉल में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में उन्‍होंने मराठी में कहा था- ‘अता पुष्कळ झाला, अता नको…(अब बहुत हुआ, अब नहीं..)।’ वाजपेयी की जुबान से निकले इस शब्द को याद कर भाजपा के पुराने कार्यकर्ता आज भी सहम जाते हैं। उनका कहना है कि शब्दों के बाजीगर और दूरदृष्टि के धनी वाजपेयी शायद समझ चुके थे कि 2004 के चुनाव में एनडीए गठबंधन की सरकार नहीं बनेगी और लंबे इंतजार में शायद शरीर उनका साथ न दे।
वाजपेयी को यह अहसास हो चुका था कि‍ बीजेपी के पक्ष में जब तक फिर से माहौल बनेगा, तब तक शायद उनका शरीर व स्वास्थ्य साथ न दे। अनुभवी पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि भाषण के आखिर में वाजपेयी जो भी सरल या हास्य लहजे में बोला करते थे, उसके बड़े मायने होते थे। याद दिला दें कि जनसंघ के बाद जव भाजपा का गठन हुआ था तब इसी षण्मुखानंद हाल में वाजपेयी की ताजपोशी हुई थी। वाजपेयी ने जहां से शुरूआत करके भाजपा को बुलंदियों तक पहुंचाया था, वहीं पर देश का प्रधानमंत्री रहते हुए, राजनीति से सन्यास लेने का संकेत दिया था।
 प्रधानमंत्री रहते हुए वाजपेयी में पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में हिस्सा लेने मुंबई पहुंचे थे। इस सम्मेलन को लेकर मुंबई में काफी सियासी हलचल थी। मीडिया में भी कार्यक्रम की कवरेज को लेकर काफी उत्सुकता थी। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां बढ़ रही थीं। इधर कमजोर हो चुकी कांग्रेस में सोनिया गांधी के नेतृत्व ने जान फूंक दी थी। वाबजूद इसके कांग्रेसी अपनी जीत को लेकर असमंजस में थे। दूसरी ओर भाजपा और शिवसेना कार्यकर्ता उत्साह से लबरेज थे।
         खचाखच भरे षण्मुखानंद हाल में कार्यकर्ता अटल जी के भाषण का इंतजार कर रहे थे। भाजपा -शिवसेना युति के नारों के साथ अटल बिहारी के जयकारों से पूरा हाल गूंज रहा था। जैसे ही अटलजी अपना भाषण शुरू करने खड़े हुए कार्यकर्ताओं ने अबकी बारी अटल बिहारी के नारे लगाने लगे। मंच पर मौजूद पूर्व भाजपा नेता दिवंगत गोपीनाथ मुंडे और शिवसेना के  कुछ नेता कार्यकर्ताओं को शांत कराने लगे लेकिन कार्यकर्ता उनकी सुनने को तैयार नहीं थे। आखिर में अटल जी खुद कार्यकर्ताओं को शांत कराया और भाषण की शुरूआत की। उनके भाषण की शुरूआत होते ही पूरे हाल में शांति छा गई। कार्यकर्ताओं ने अपने नेता के परामर्श और मार्गदर्शन को ध्यान से सुना। जैसे ही वे अपना भाषण समाप्त कर अपनी कुर्सी की ओर बढ़े, कार्यकर्ताओं ने फिर अपकी बारी अटल बिहारी के जयकारे लगाने शुरू कर दिए। अटलजी फिऱ से अपनी कुर्सी से उठे और माइक के पास आकर कहा … अता नको….. पुष्कळ झाला…. इन्हीं शब्दों के साथ उन्होंने राजनीति से संन्यास लेने का संकेत देशवासियों को दिया। कई आंदोलनों व राजनीतिक विरासत की गवाह रही षष्मुखानंद हाल फिर एकबार इतिहास के पन्नों को अपने आप में समेट लिया।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद युवा भाजपाई उत्साह के साथ अपने घरों की ओर बढ़ निकले थे। परंतु पुराने भाजपाईयों के चेहरे पर खामोशी साफ झलक रही थी। वे समझ चुके थे कि अब उनका लाडला नेता राजनीति को अंतिम विदाई दे चुका है। भविष्य में हुआ भी यही 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन की हार हुई। महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना गठबंधन सरकार सत्ता से बेदखल हुई।
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