कहाँ गए वो स्वर, उच्चारण और अंदाज़ !

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राजेश बदल, वरिष्ठ पत्रकार

बीते दिनों एक प्रसारण केंद्र में रेडियो जॉकी या पुरानी परिभाषा के मुताबिक़ उदघोषक का चुनाव करने वाले निर्णायक मंडल में शामिल होने का अवसर मिला । प्रतिभागियों को स्वर परीक्षा से गुजरना था । दो दिन में क़रीब साठ सत्तर उम्मीदवारों के कंठ और प्रसारण व्यवहार को जाँचना था ।

बड़े उत्साह से हम तीन लोग उन्हें सुनना चाहते थे । मेरी अपनी दिलचस्पी इसलिए भी थी कि मैं ख़ुद आकाशवाणी के लिए चालीस बयालीस बरस पहले एक कंपेयर और उदघोषक की परीक्षा का सामना कर चुका था । कुछ बरस मैंने बतौर अनाउंसर भी काम किया । वो एक ऐसा दौर था जब हमें  लोग आवाज़ के आधार पर गाँवों और शहरों में पहचानते थे । जाते ,आकाशवाणी का टेपरिकॉर्डर लेकर गाड़ी से उतरते ,लोगों से बतियातेऔर वो तुरन्त नाम लेकर पूछते’-आप तो वो हैं न ?

 

आज ज्ञान और संचार के आधुनिक साधन हैं , सुनने के लिए दुनिया भर के रेडियो और टीवी स्टेशन हैं ,स्वर – प्रसारण पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थान हैं ,उच्चारण ठीक करने के लिए भी तमाम कोर्स हैं फिर भी हमें चार या पाँच लोग बड़ी मुश्किल से मिले । ऐसा क्यों है ?

 

उन दिनों टेलिविजन नहीं आया था …
हमने स्वर परीक्षण शुरू किया । जो प्रश्नपत्र उन्हें दिया गया था – मेरी नज़र में बहुत आसान था । लेकिन दो दिन के बाद कह सकता हूँ कि हमें बड़ी निराशा हुई । आज ज्ञान और संचार के आधुनिक साधन हैं , सुनने के लिए दुनिया भर के रेडियो और टीवी स्टेशन हैं ,स्वर – प्रसारण पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थान हैं ,उच्चारण ठीक करने के लिए भी तमाम कोर्स हैं फिर भी हमें चार या पाँच लोग बड़ी मुश्किल से मिले ।
ऐसा क्यों है ?

इस प्रश्न का उत्तर हममे से किसी के पास नहीं था । सारे के सारे स्टार रेडियो जॉकी बनना चाहते हैं लेकिन उसके लिए तैयारी कुछ नहीं । न उच्चारण ठीक,न शब्दों की अदायगी और न अपनी बोली के प्रभाव से मुक्त हो पा रहे थे । किसी को देवकी नंदन पांडे ,इंदूवाही,अशोक वाजपेयी,जसदेव सिंह और अमीन सायानी के बारे में पता नहीं । क्या किसी को याद है कि एक ज़माने में बुधवार की शाम आठ बजते ही शहरों और कस्बों में कर्फ्यू जैसा सन्नाटा हो जाता था । अमीन सायानी की बहनों और भाइयो सुनते ही धड़कने तेज़ हो जाती थीं और देवकी नंदन पांडे की गरजदार आवाज़ में – ये आकाशवाणी है ! सुनते ही क़दम थम जाते थे । लगता था जैसे पांडे जी ने वाणी सम्मोहन से बांध लिया है । भारत के इन महानायकों के बारे में नहीं जानते ये लोग ।

सच ! बड़ा अफसोस हुआ ।
आवाज़ के बुनियादी संस्कारों से वंचित यह पीढ़ी निजी टीवी चैनलों और एफएम रेडियो केंद्रों  के एंकर / अनाउंसर की कॉपी करती है ।जोआवाज़ की बारीकियां नहीं जानते , जिन्हें स्वर का उतार चढ़ाव नहीं मालूम, ठहराव का असर नहीं पता,बोलने और लिखने वाले शब्दों का फ़र्क़ नही समझते, उनको देख सुनकर नए बच्चे इस पेशे को अपनाना चाहते हैं ।
क्या किया जाए ?

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