न्यूक्लियर पावर: भ्रांतियां और सत्य 

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प्रितपाल कौर, सलाहकार सम्पादक, 6डी

कैगा (कर्नाटक), ऩ्यूक्लियर पावर यानि परमाणु ऊर्जा को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और अफवाहें समय समय पर मीडिया और कुछ शरारती तत्व समाज में फैलाते रहते हैं.  जैसे कि परमाणु ऊर्जा से होने वाले विकिरण से कैंसर जैसी बीमारी फैलती  है.  या कि परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल से सिर्फ परमाणु बम्ब ही बनाया जा सकता है या बनाया जाता है.  कि कोई भी सरकार परमाणु ऊर्जा पर रिएक्टर बनाने के नाम पर परमाणु बम्ब बना कर देश की स्थिरता के लिए खतरा पैदा करती है.

इसके अलावा परमाणु ऊर्जा को लेकर एक आम धारणा यह भी प्रचलित है कि रेडियो एक्टिव तत्वों के इस्तेमाल के दौरान उनसे जो विकिरण निकलते हैं वे मनुष्यों,  जीव जंतुओं,  वनस्पतियों,  जानवरों,  हवा,  पानी यानि कि पूरे पर्यावरण को दूषित कर डालते हैं.
जबकि हकीकत इन सबके विपरीत है.  परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल किस तरह पूरी जिम्मेदारी और भरपूर सावधानी के साथ भारत में किया जा रहा है,  इसकी पूरी जानकारी देने के लिए 26 अगस्त से 30अगस्त तक एक वर्कशॉप भारत के चुनिंदा पत्रकारों के लिए कैगा,  कर्नाटक में परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा आयोजित किया जा रहा है.  एन पी आई सी एल के कैगा बिजली उत्पादन केन्द्र के परिसर में हुई 4 दिवसीय वर्कशॉप में नैशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया)  के पत्रकारों सहित कई वरिष्ठ पत्रकारों ने शिरकत की.
यूरेनियम 235 व यूरेनियम 238 के मिश्रण से नैसर्गिक फिशन के ज़रिए बिजली उत्पादन
बेहद सहज और जागरूक माहौल में वैग्यानिकों ने जानकारी दी कि किस तरह सम्पूर्ण सुरक्षित वातावरण में यूरेनियम 235 व यूरेनियम 238 के मिश्रण से नैसर्गिक फिशन के ज़रिए पैदा हुई ऊष्मा से टर्बाइन को चला कर बिजली पैदा की जा रही है. दक्षिणी ग्रिड में प्रवाहित कर दी जाती है.  जिसे फिर देश के दूसरे हिस्सों में भेजा जाता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ऊर्जा उत्पादन का यह तरीका बेहद इकनॉमिकल तो है ही,  साथ ही बहुत ही सुरक्षित भी..  रेडियो एक्टिव यूरेनियम के भंडार हमारे अपने देश में मौजूद हैं.  वर्तमान में झारखंड की जादूगुडा खदानों से इसकी माइनिंग कर के साफ सफाई के बाद यहां छ: स्तरों की सुरक्षित व्यवस्था के तहत फिशन के लिए प्रस्तुत किया जाता है.  बाद में बचे हुए रेडियो एक्टिव यूरेनियम का भंडारण भी वैसी ही छ: स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के तहत किया जाता है,  जहां 300साल में यह पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाएगा.
पर्यावरण पर नजर रखने की मुहिम के तहत  हर साल देश भर से पक्षी विशेषज्ञों का यहां कैगा में जमावड़ा होता है और उन्होंने रिकार्ड किया है कि हर वर्ष कुछ नई प्रजातियों के पक्षी और यहां आ कर बसने लगे हैं. तितलियों की प्रजातियों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है.  इसके अलावा काली नदी के किनारे सहयाद्रि पहाडों की श्रृंखला में बनाए गए इस परमाणु रिएक्टर के आस पास का इलाका एक बेहतरीन जंगल है जो वक्त के साथ और समृद्ध हो रहा है.  मछलियों की संख्या नदी में बढ गई है जिससे स्थानीय मछुआरों की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है.  साथ ही रिएक्टर के टाउनशिप के आने से हजारों स्थानीय लोगों को रोज़गार मिला है.  परमाणु ऊर्जा विभाग ने स्कूल स्थापित किए हैं,  बच्चों के लिए शिक्षक और बसों की व्यवस्था का है.
बेहद महत्वपूर्ण बात कि जिस कैंसर जैसी घातक बीमारी होने की बात परमाणु विकिरण से होने की अफवाह कुछ एन. जी. ओ.  द्वारा फैलाई जाती है,  वह कैंसर परमाणु रिएक्टर के विकिरण से नहीं होता क्योंकि इसके लीक होने की सम्भावना शून्य है अलबत्ता इसी रिएक्टर के ईंधन से प्राप्त कुछ आइसोटोप कैंसर जैसी घातक बीमारी का इलाज तो होता ही है,  साथ ही और कई बीमारियों की पहचान और निदान में आइसोटोप इस्तेमाल किए जाते हैं.  खाद्य पदारथों के संरक्षण और फसलों के सुरक्षित जेनेटिक इंजीनियरिंग में भी इन आइसोटोप का प्रयोग किया जाता है..
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