मोहन महज सफेद शेर नहीं, लोक नायक है !

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असद खान, इतिहासकार एवं लेखक

27 मई सन् 1951 के आस पास का समय रहा होगा, आजादी को मिले 3 वर्ष  हो रहे थे, एक दिन रीवा नरेश मार्तण्ड सिंह जूदेव को समाचार मिला ‘कि सीधी जिले की गौपद-बनास  के “कैमूर-केहचुआ” के जंगल में शेर-शेरनी के एक जोड़े के आतंक से जनता परेशान है और रीवा नरेश मार्तण्ड सिंह से मुक्ति की गुहार लगा रही है।

तुरंत शेरो को  पकड़ने के लिए हरकारे भेजे गये स्वयं मार्तण्ड सिंह जूदेव ने “बरगड़ी” मे शिविर लगाया।  हांका डाला गया ,पकडने की कवायद में शेरों का जोड़ा तो नहीं मिला, लेकिन 27 मई 1951 को एक शेरनी चार शावकों के साथ जंगल मे दिख गई ! जिसमें तीन तो सामान्य थे, लेकिन एक अलग रंग का( सफेद) था। महाराज साहब का हुक्म हुआ इस शावक को किसी भी हालत में जीवित पकडना है ,थोड़ी मशक्कत के बाद उसे पकड़ लिया गया, रीवा महाराज अद्भुत शावक को साथ ले आए।

 

रीवा-सीधी से पूरी दुनिया में पहुंचे सभी सफेद शेर मोहन के वंशज हैं, महाराज ने सफेद शेर का एक शावक तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति आइजन हॉवर* को भेंट किया,  (चंपा-चमेली)सफेद शेरों का जोड़ा इंग्लैंड गया।

महाराज ने सफेद शावक का नाम मोहन रखा  ! और लालन पालन का बंदोबस्त किया !  समय आने  पर योजना अनुसार  वंश वृध्दि के प्रयास किये, पर सफलता न मिली। पुनः प्रयोग के तौर पर पीले रंग की (सुकेशी ) शेरनी  को मोहन के साथ रखा गया,  मोहन और सुकेशी के जोड़े से तीन बार बच्चे हुए लेकिन सब साधारण ही रहे!  पर महराज साहब निराश नहीं हुऐ,

एक बार फिर महाराज मार्तण्ड सिंह ने मोहन और सुकेशी से जन्मी शेरनी राधा को मोहन के साथ रखा और इस बार वही हुआ जिसका अंदाजा महाराज साहब को पूर्व से था, इतिहास रचा गया। राधा और मोहन के संगम से अक्टूबर 1958 में चार सफेद शावकों का जन्म हुआ। इसी जोड़े से 1960 में तीन बच्चे और पैदा हुए। इनमें दो सफेद और एक पीला था। 1962 में फिर  दो बच्चे हुए और दोनों ही सफेद थे। इस तरह सफेद शेरों का सिलसिला चल निकला। रीवा-सीधी से पूरी दुनिया में पहुंचे सभी सफेद शेर मोहन के वंशज हैं, महाराज ने सफेद शेर का एक शावक तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति आइजन हॉवर* को भेंट किया,  (चंपा-चमेली)सफेद शेरों का जोड़ा इंग्लैंड गया।

*कोलकाता के चिड़ियाघर(नीलाद्रि- हिमाद्रि) जोड़ा गया। राधा-मोहन से पैदा हुए बाकी शावकों को दिल्ली के चिड़ियाघर में भेज दिया गया।लेकिन रीवा महाराज  राधा-मोहन और सुकेशी को अपने साथ रखे रहे! आखिर एक दिन दुखद पल भी आया जब बीमार मोहन को लाख प्रयासों के बाद भी नहीं बचाया जा सका ! 18 दिसंबर 1969 को सफेद शेर मोहन की मौत हो गई।

मोहन की मौत से रीवा में मातम छा गया। स्कूलों में छुट्टी कर दी गई, बाजार बन्द थे। शोक सभाएं हुईं  सफेद शेर रीवा का गौरव बन चुका था विश्वभर में रीवा की पहचान सफेद शेर के कारण होने लगी थी।  महाराज साहब बहुत दुखी हुए ,पर नियति अटल है।

मोहन के कई किस्से  सुनने को मिलते हैं।  जैसे कि मोहन हफ्ते में एक दिन शाकाहारी रहता था।  राखी- कजालियां के दिन महिलाएं कजरी गाते हुए उसके बाड़े से गुजरतीं, तो वह भाव-विभोर हो जाता। उसे कजलियां देती तथा लम्बी उम्र की कामना करती थी। एक किस्सा और कि मोहन एकादशी का व्रत रखता था और शाम को महाराजा साहब को देखकर ब्रत  खत्म करता !

मोहन महज सफेद शेर ही नहीं वरन लोक नायक है

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